• #बतकहीबाज : जालिम दुनिया! आप शब्दों की शक्ल में रोज दिखते रहा करिए

    Vinay Kumar Pandey
    व्यंग्य

    सप्ताह भर से बतकहीबाज पढ़ने को नहीं मिला तो इस कॉलम के एक रीडर व्याकुल हो गए। हल्की सी कोशिश के बाद उन्हें मेरा मोबाइल नंबर मिल गया। कॉल कर बोले, मैं दो-तीन दिन से आपको फोन करने की सोच रहा था। मैंने कॉल करने का आशय पूछा, उनका कहना था आप शब्दों की शक्ल में रोज दिखते रहा करिए। बोले बतकहीबाज पढ़ने के लिए रोज इंतजार करता हूं लेकिन आप नहीं मिलते। तारीफ के पुल पर चलना मुझे पसंद नहीं, उनकी गुजारिश थी, लिहाजा हाजिर है आज का बतकहीबाज!

    अवतरित हुए

    खैर, हर युग में अवतरित हुए जरुरत से ज्यादा लेकिन आवश्यकता से कम श्याने लोग इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं, आलस कोई दुर्गुण नहीं हैं, ये तो दुनियादारी और मोहमाया से मुंह मोड़ लेने का एक आसान आध्यात्मिक तरीका है। आलसी शख्स बिन किसी को तकलीफ दिए, बिन किसी गिव या टेक के सभी प्रलोभनों को ओवरटेक कर, सिक्स लेन वाले मोक्ष मार्ग पर बिना कोई टोल टैक्स दिए अपनी गाड़ी और कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा सकता है। जिस दिन जालिम दुनिया ये समझ लेगी उसी दिन से सभी समस्याएं नेताओं की ईमानदारी की तरह छू मंतर हो जाएंगी।

    खतरा नहीं

    आलसी लोगों को चाहे कोई कितना भी भला-बुरा क्यों न कहे? वो कभी खफा नहीं होते। मसले को समझिए, बुरा मानने के बाद गुस्सा आता है, झगड़े और कलह को जन्म देता है, इससे रिश्तों में दरार आने की संभावना रहती है। आज के भौतिकतावादी युग में सामाजिक मूल्यों को बनाये रखने में आलसी महापुरुष अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं। जहां अधिकतर लोग सफलता मिलने के बाद बदल जाते हैं और ईवन डे पर अपनी मंहगी कार में और ऑड डे पर अपने अभिमान पर सवारी करने लगते हैं, वहीं आलसी लोगों से सभ्य समाज को ऐसा कोई खतरा नहीं हैं। क्यों, आज कल फॉग की जगह यही चल रहा है न?

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