• #बतकहीबाज : दैनिक किश्त! टक्कर देने के लिए रोज खाली पेट चक्कर लगाने का फैसला

    Vinay Kumar Pandey
    व्यंग्य

    बतकहीबाज की पिछली कड़ी ‘इस्तेमाल! उन्होंने अधिकृत रूप से उम्मीद का दामन और दुपट्टा नहीं छोड़ा’ में आप मेरे पड़ोसी गुप्ता जी से रूबरू हुए थे। अरे वही गुप्ता जी जिन्होंने बताया, मॉर्निंग वॉक पर स्वच्छ और ताजा हवा आपको मुसीबतों की तरह गले लगाने को तैयार रहती है। वह दिन चढ़ने पर अच्छे दिनों की तरह दूर भागती है। गुप्ता जी से अधिक बतकहीबाज बैंक वाले शर्मा जी हैं। शर्मा जी की बात पर विश्वास किया जाए तो वैज्ञानिक अपने ज्ञान को ललकारते हुए बताते हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। मनोवैज्ञानिक अपनी मानसिकता को पुचकारते हुए समझाते हैं कि पृथ्वी का केवल अपनी धुरी पर घूमना पर्याप्त नहीं है, लगातार घूमने के लिए धुरी पर घूमने के अलावा अपनी धुन में घूमना भी जरूरी होता है। पृथ्वी अकेली घूमती रहे, यह पृथ्वीवासियों की शर्म और मर्म दोनों की सेहत के लिए हानिकारक है।

    जुबान की स्पीड

    बैंक के लोन विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले शर्मा जी बताते हैं, इसीलिए पृथ्वीवासियों ने भी पृथ्वी को टक्कर देने के लिए रोज चक्कर लगाने का फैसला खाली पेट ले लिया। उनका दावा है, मॉर्निंग वॉक के वक्त महिला मंडली के जुबान की स्पीड उनके कदमों से कहीं तेज होती हैे। सबसे तेज होने का दावा करने वाले खबरिया चैनल भी उनसे रेस लगाने का रिस्क नहीं ले सकते हैं। कुछ वरिष्ठ और सम्मानित जैसे दिखने वाले लोग अपनी बॉडी लेंग्वेज से ऐसी प्रदर्शनी लगाते हैं, मानो सुबह की सैर पर आकर वो मानवता के सारे कष्ट नष्ट करने की अपनी महानता की दैनिक किश्त चुका रहे हों।

    जिगर से बीड़ी जलाने का माद्दा

    बैंक वाले शर्मा जी बोलते हैं, राजनीती और कूटनीति के सभी विशेषज्ञ मॉर्निंग वॉक के टाइम बिना किसी औपचारिक मंडी के थोक के भाव में उपलब्ध होते हैं। देश दुनिया के ज्वलंत मुद्दों पर वे जिगर से बीड़ी जलाने का माद्दा रखते हैं। मॉर्निंग वॉक के शाब्दिक अर्थ को धत्ता बता कर कुछ दुसाहसी लोग अपने कदमों का बेहतरीन इस्तेमाल कर दौड़ते हुए नजर आते हैं तो कुछ सज्जन, निर्जन स्थान ढूंढकर कसरत में रत होते हैं।

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