• #बतकहीबाज! बड़ा होने पर उनके हाथ पीले और गाल लाल करके घर से विदा कर दें

    Vinay Kumar Pandey
    व्यंग्य

    पुराने जमाने से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा है, नहीं? लोग कहते हैं ‘जो सोवत है, वो खोवत है’। धमकाते हैं, ‘अलसस्य कुतो विद्या’। आलसी लोगों को ताने मारने की कोशिश अनंतकाल से जारी है। बट, लेकिन, किंतु, परंतु, फिर भी आज तक (न्यूज चैनल नहीं) आलस और आलसियों का वजूद ‘सेट मैक्स चैनल’ पर ‘सूर्यवंशम’ की तरह जस का तस बना है। मूवी सूर्यवंशम का निहितार्थ ये है कि बुराई का विरोध करने से वो ज्यादा बढ़ती है।

    सियाचिन की बर्फ

    भाई, बुराइयों को कोसे नहीं। प्यार से पाले-पोसें। बड़ा होने पर उनके हाथ पीले और गाल लाल करके घर से विदा कर दें। आलसी लोग बिना दब के, कब के, समाज के हर तबके में अपनी पैठ सियाचिन की बर्फ की तरह जमा चुके हैं। सरल तरीके से इस मसले को आप ऐसे समझिए, बॉलीवुड में ऐसे कई आलसी एक्टर, एक्ट्रेस और डायरेक्टर्स भरे हैं जो साल भर में केवल एक ही फिल्म करते हैं। चूंकि वो बड़े लोग हैं, हैं न? इसीलिए उनके आलस को परफेक्शन की पैकिंग में बेच दिया जाता है।

    नाम थोड़े लिखा है

    पता है, कुछ डायरेक्टर्स तो इतने आलसी होते हैं की फिल्म की स्क्रिप्ट सेलेक्ट करने में ही तीन से चार साल निकाल देते हैं। वैसे ये डायरेक्टर्स हिम्मत करके थोड़ा आलस और दिखाएं तो सरकारें पंचवर्षीय योजनायें बनाने और क्रियान्वित करने में भी इनकी मदद ले सकती हैं। देखिए, इससे फायदा ये होगा कि सरकार और उनके मंत्री संसद-विधानसभा, आदि-इत्यादि जगहों पर अंदर और बाहर थोड़ा और आराम से सो सकेंगे। ना, ना, आप अपने पर बिल्कुल न लीजिए। मैंने आपका नाम थोड़े लिखा है। क्यों?

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