• #बतकहीबाज : टैग गिरोह! डिजिटल आपाधापी के घोर कलयुग में इंसानियत

    Vinay Kumar Pandey
    व्यंग्य

    फेसबुक को अगर आभासी दुनिया माना जाता है तो फेसबुक पर टैग करने वाले गिरोह को शांति भंग करने वाला असामाजिक तत्व मान लेने में कोई संशय नहीं होना चाहिए। दरअसल फेसबुक पर टैग करने ‘वाले एकला चालो रे’ की विचारधारा के विरोधी होते हैं। वे हर काम को समूह में करके सामूहिकता का नेतृत्व कर इस आभासी दुनिया में असामाजिकता को वायरल करना चाहते हैं। फेसबुक ने लोगों इतना एकाकी बना दिया है कि वे अपने आसपास की दुनिया से बेखबर रह कर केवल अपने न्यूजफिड से खबरे लेते हैं। इसी एकाकीपन को ‘टैग गिरोह’ अपनी कारस्तानी से भंग करता है।

    जख्मों पर आयोडीन युक्त नमक

    कोई भी लाइक-कमेंट टपकातुर प्रयोजन हो, टैग गिरोह हर मौके पर तब तक हैप्पी और प्राऊड नहीं फील करता है जब तक अपनी टाइमलाइन पर 10-15 फोटो पोस्ट कर थोक के भाव में लोगों को टांग न दे, मतलब टैग न कर दे। किसी पोस्ट में टैगीत व्यक्ति ठीक उसी तरह से महसूस करता है जैसे किसी हैंगर में टंगा हुआ शर्ट। टैग की हुई पोस्ट पर आने वाला हर लाइक और कमेंट आपको ऐसे चिढ़ाते हैं मानो आपके जख्मो पर आयोडीन युक्त नमक छिड़क रहे हों। टैग कर-करके ‘टैग माफिया’ आपके वाल की हालत विज्ञापनों से सजी सार्वजनिक दीवार की तरह कर देते हैं।

    भावविभोर हो जाते हैं

    डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में भी इंसानियत पूरी तरीके से खत्म नहीं हुई है। अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने देते हैं। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग तो टैग किए जाने पर इतने भावविभोर हो जाते हैं कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते हैं। कमेंट बॉक्स में थैंक्स फॉर द टैग लिखकर टैगीत होने के कर्ज से मुक्त होते हैं। पहले के जमाने में रिश्ते प्रेम के धागे से बंधे होते थे। वक्त ने करवट के साथ जब जम्हाई भी ली तो रिश्ते धागों की गांठे खोलकर डिजिटल होकर फेसबुक की वाल्स पर टांग दिए गए। खैर, ‘टैग गिरोह’ से आप भी परेशान हैं?

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