• #बतकहीबाज : लालबत्ती! गाड़ी अपने गंतव्य तक पहुंच कर वीआईपी होने के मंतव्य को पूरा करती थी

    Vinay Kumar Pandey

    व्यंग्य

    याद होगा, लालबत्ती सिर्फ रोशनी ही नहीं देती थी बल्कि वीआईपी कल्चर को शोभा भी देती थी। लालबत्ती गुल होने से वीआईपी और वीवीआईपी होने का चिराग तो नहीं बुझा लेकिन उसकी रोशनी धीमी हो गई। पहले लालबत्ती वाली गाड़ी के रोड पर उतरते ही आपातकाल सा माहौल हो जाता था। अब केवल आपातकालीन सेवाओं से जुड़े वाहनों पर ही लालबत्ती का इस्तेमाल संभव है। लालबत्ती स्टेटस सिंबल हुआ करती थी। बिना लालबत्ती के मानो स्टेटस सिंबल दिव्यांग सा फील दे रहा है। बिन लालबत्ती के वीआईपी होना ठीक वैसा ही है जैसे बिना घोटाले की सरकार।

    समाजवाद लाने के लिए

    लालबत्ती हटाकर सरकार ने न केवल उस महान वीआईपी परंपरा जिसे कई नेताओं और अधिकारियों ने अपनी कार और अहंकार से सींच कर इस मुकाम तक पहुंचाया था, को लांछित करने की कोशिश किया बल्कि आम इंसान की छवि को धूमिल करने का भी प्रयास किया। बात साफ है, जब तक समाज में वीआईपी रहेंगे तब तक आम इंसान उनको देखकर अपने को छोटा महसूस करता रहेगा। सरकारें उसके उत्थान के लिए कदम उठाती रहेंगी। सोचिए, अगर समाज से वीआईपी सभ्यता खत्म हो गई और सभी आम इंसान हो गए तो सरकारें आम इंसान के कल्याण के लिए कहां से प्रेरणा लेंगी? असली समाजवाद लाने के लिए देश में विशिष्ट और विशिष्टता का रहना नितांत आवश्यक है, नहीं?

    लॉन से निकली गाड़ी

    जो लोग लालबत्ती का रौब जमाते थे, इस निर्णय से उनके मुंह में अब दही जम चुका है, ताकि इस मुद्दे पर अच्छे से रायता फैलाया जा सके। याद करिए, लालबत्ती से सजी गाड़ी जब शान से निकलती थी तो अच्छे-अच्छों की हवा बिना स्क्रू-ड्राईवर के ही टाइट हो जाया करती थी। साहब के लॉन से निकली गाड़ी बिना किसी चालान के सायरन बजाती हुई रेडलाइट क्रॉस कर पूरी ठसक से अपने गंतव्य तक पहुंच कर वीआईपी होने के मंतव्य को पूरा करती थी।

    Print Friendly, PDF & Email

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    error: Content is protected !!