• #बतकहीबाज : Depression! लोग अर्थ के ही कायल हैं, अर्थ से ही घायल हैं

    Vinay Kumar Pandey
    व्यंग्य

    बदलते दौर में अर्थ का अर्थ भी Change हो गया है। दिमाग पर बल देंगे तो आपको समझ में आएगा, हमेशा नैतिकता की बात करने वाला शख्स ही सबसे ज्यादा अनैतिक काम करता है। जैसे गिरगिट रंग Change करता है, ठीक उसी तरीके से इंसान अर्थ का अर्थ बदलता है। आपका अपना न जाने कब बदलते हालात की जद में आने के बाद विश्वास के अर्थ का अर्थ उसका शिकार कर खत्म कर दे, कोई गारंटी नहीं। किसी जमाने में जनसेवा के मायने रहे होंगे जनसरोकार से जुड़े हुए। हालात में आई तब्दीली के बाद जनसेवा का अर्थ मलाई काटना हो गया है।

    समर्थ अब असमर्थ

    दो पैर वाले जानवर के लिए कुत्ता वफादारी की मिसाल है। Practical तौर पर Certified है, इंसान कुत्ते से सीखता बस इतना भर है कि पूंछ किस तरीके से हिलाना है। Practically certified होने के बाद बदल गए न वफादारी के मायने? ऐसे कई शब्द हैं जिनके अर्थ अब बदल चुके हैं। खुद अर्थ का मतलब अब आय (Income) हो गया है। मतलब परस्त लोगों ने अर्थ के समर्थ को अब असमर्थ कर दिया है। शब्द के अर्थ से अब कोई सरोकार नहीं रखता।

    धनशास्त्र समझने लगे हैं

    पैसा वाला अर्थ ही लोगों के पल्ले पड़ता है। ऐसा हो भी क्यों न? वक्ती दौर में लोगों के ईमान से आवश्यकता ने खेलना शुरू कर दिया है। व्यस्त हो चुकी जिंदगी में लोग अर्थ के ही कायल हैं, अर्थ से ही घायल हैं। जिन लोगों के पास अर्थ का जरिया नहीं है वो हर रोज Depression को Interview देते हैं। जरूरत ने लोगों को इतना चटका रखा है कि अर्थशास्त्र का मतलब भी लोग अब धनशास्त्र समझने लगे हैं। शब्द के कोष में भी अर्थ नहीं मिलता है। आमद का जरिया समझने में इंसान असमर्थ होता है जा रहा है।

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