• #Editorial : बिहार की राजनैतिक हैवानियत से शर्मसार है पूरा देश

    Ajit Mishra
    कसक

    ज्ञान के क्षेत्र में पूरी दुनिया को अपनी लोहा मनवाने वाले गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा उनका बिहार में पैदा होना। अन्यथा इलाज के अभाव में इतनी खौफनाक मौत नहीं हुई होती। दूसरा दुर्भाग्य इस राज्य का संवेदनहीन, शिक्षा व ज्ञान का दुश्मन और अहंकारी व्यक्ति नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री होना। उपेक्षा और अपमान का तीसरा कारण जदयू और भाजपा के राजनीतिक सूत्रों की मानें तो वशिष्ठ नारायण सिंह का एक जाति विशेष में पैदा होना माना जा रहा है। एक इस मामले में यह भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बिहार भाजपा का नीतीश कुमार का इस मामले में भरपूर सहयोग मिला। यही वजह है कि उस महान गणितज्ञ की मौत के बाद भी उसकी लाश के साथ भी तिरस्कार और अपमान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा गया।

    वशिष्ठ नारायण सिंह की लाश पीएमसीएच ब्लड बैंक के सामने सड़क पर पड़ी रही। परिजनों की ओर से पीएमसीएच से उनके शव को गांव तक ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग होती रही। उनके भाई अयोध्या जी इसके लिए पैसे जमा करने को तैयार थे। लेकिन दलालों के हवाले पीएमसीएच को सौंपकर लूट मचाने वाले राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के कृपा पात्र एजेंट बिना अतिरिक्त रिश्वत लिए तैयार नहीं हुए।

    वशिष्ठ नारायण सिंह की लाश एक ट्रक पर लादी गई। उसके साथ दो गाड़ी साथ रही और उसमें से एक विधान परिषद के पूर्व सदस्य और बिहार भाजपा के संगठन महामंत्री रहे हरेंद्र प्रताप और दूसरा वशिष्ठ नारायण सिंह के परिजनों की थी। कहा जाता है कि नीतीश कुमार की जब थू-थू होने लगी और शिक्षा जगत से जुड़े शिक्षकों और छात्रों का असंतोष विस्फोटक रूप लेने लगा तब नीतीश कुमार ने अपने मंत्री जय कुमार सिंह को शव के साथ उनके गांव वसंतपुर साथ जाने को कहा। शव के साथ जय कुमार सिंह चले भी, उनके साथ स्कॉट करती पुलिस गाड़ियों का काफिला भी चला लेकिन वह काफिला ट्रक पर चल रहे शव और परिजनों को कोईलवर पुल की जाम के हवाले छोड़ कर आगे निकल गया। लोगों को जब यह पता चला कि मंत्री के काफिले में चल रहे एंबुलेंस में वशिष्ठ बाबू का शव नहीं था तो जबरदस्त प्रतिक्रिया व्यक्त होने लगी। किसी ने कहा मंत्री जी में वजन कम रफ्तार ज्यादा है। कुल मिलाकर वशिष्ठ नारायण सिंह के शव के साथ चल रहे पूर्व विधायक हरेंद्र प्रताप ने बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय सहित अन्य अधिकारियों से बातचीत की और किसी तरह स्थानीय लोगों के सहयोग से जाम से निकाला गया।

    इसके अलावा मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा और जदयू के एक विधायक और मंत्री कहीं नजर नहीं आए। भाजपा की ओर से संजय टाइगर ठीक उसी तरह थे जिस तरह छोटू सिंह जदयू का प्रतिनिधित्व पीएमसीएच में कर रहे थे। बाद में भाजपा के पूर्व विधायक अमरेन्द्र प्रताप सिंह जरूर पहुंचे जो आया से क‌ई बार विधायक रह चुके हैं।

    कमाल है वशिष्ठ नारायण सिंह की मृत्यु पर भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ट्विटर पर श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए राष्ट्र का अपूर्णीय क्षति बता रहे हैं मगर उससे कुछ मील की दूरी पर भारत सरकार के केन्द्रीय राज्यमंत्री मंत्री बाबा चौबे उनके अंत्येष्टि में शामिल होने की बात तो दूर शोक संवेदना व्यक्त करना भी जरूरी नहीं समझा। पीएमसीएच, पटना में वशिष्ठ बाबू ने अंतिम सांस ली और उससे कुछ सौ मीटर की दूरी पर नीतीश सरकार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी रहते हैं, उनके पार्थिव शरीर पीएमसीएच के सामने सड़क पर घंटों पड़ा रहा है और एक बार झांकना जरूरी नहीं माना। इस हिम्मत और अहंकार के गुरूर को दाद देनी होगी।

    वशिष्ठ नारायण सिंह की उपेक्षा और मरनोपरांत अपमान इस देश का अपमान नहीं है? आखिर कुछ तो वजह रही होगी? इसपर चर्चा आगे करेंगे। हम उस कसक की चर्चा भी करेंगे कि आज भी लालू प्रसाद के बाहर नहीं रहने की कसक वशिष्ठ नारायण सिंह के गांव के लोगों को कितनी है। जारी…

    :- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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