• Identity Crisis- ताकि समाज का अटेंशन मिल सके ! पहचान के संकट से जूझ रहे लोग अक्सर अपनाते हैं ये रास्ता

    अगर आप सोशल मीडिया पर अधिक वक्त देते हैं तो ये खबर आपके लिए है। दरअसल हम सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं। यूं तो सोशल मीडिया हमारे लिए कई मायनों में सहायक साबित हुआ है, पर हम यह भी नकार नहीं सकते कि इन प्लेटफार्म्स पर ऑनलाइन क्राइम भी बढ़े हैं। इंटरनेट पर साइबर क्राइम के अलावा एक और समस्या है, जो अब विकराल रुप लेती जा रही है।हंसी मजाक और टांग खींचने से शुरु हुआ ट्रोलिंग, अब इंटरनेट के बदलते स्वरूप के चलते Character Assassination जैसी गंभीर समस्या बनता जा रहा है।

    Troll क्या है ?

    नार्थ यूरोप (स्कैंडेनेविया) की लोक-कथाओं में एक ऐसे बदशक्ल और भयानक जीव का जिक्र आता है, जिसका नाम ट्रोल था। इस जीव से लोग डरकर अपनी यात्रा नहीं कर पाते थे। लोक-कथाओं के राहगीरों की तरह फेसबुक या ट्विटर के यात्रियों का सफर भी ट्रोल की वजह से अधूरा रह जाता है, क्योंकि उनकी बात जिस दिशा में जानी थी वहां न जाकर भटक जाती है। इंटरनेट ट्रोलिंग में किसी व्यक्ति का मकसद, सोशल मीडिया के किसी प्लेटफार्म के जरिए (मसलन Whatsapp, स्नैपचैट, ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर) लोगों को उकसाना, भड़काना व विषय संबंधित सामान्य चर्चा में गड़बड़ी फैलाना होता है।

    इंटरनेट की दुनिया में ट्रोल वो भी होते हैं, जो किसी भी मुद्दे पर चल रही चर्चा में कूदते हैं और आक्रामक बातों से विषय को भटका देते हैं। इसके अलावा ये लोग इंटरनेट पर दूसरों पर छींटाकशी, गालियों के अलावा बेवजह ऐसे मामले में घसीटते हैं, जिससे उन्हें मानसिक परेशानी होती है।

    क्यों करते हैं लोग ट्रोलिंग ?

    ट्रोलिंग करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ट्रोलिंग फन के साथ-साथ किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। सामान्यत: तीन तरह की ट्रोलिंग की जाती है।

    Corporate Trolling

    कॉर्पोरेट ट्रोलिंग में व्यवसायिक रूप से षड्यंत्र रचे जाते हैं, जैसे किसी कंपनी के झूठी तरक्की का जिक्र किया जाता है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग कंपनी से जुड़ सकें। किसी भी ऑर्गनाइजेशन का उद्देश्य लाभ कमाना होता है जिसके लिए वे ट्रोलिंग का प्रयोग करते हैं।

    पॉलीटिकल ट्रोलिंग

    राजनीतिक दल और सत्ता में बैठी सरकारें सोची-समझी रणनीति के तहत ट्रोल्स की फौज खड़ी कर देती हैं ताकि उनके खिलाफ सोशल मीडिया में कोई निगेटिव हवा न बन पाए। आमतौर पर देखा जाता है कि इन ट्रोल्स को मुद्दे से भटकाने और सरकार के समर्थन में हवा बनाने के लिए आर्थिक मदद भी की जाती है। ऐसे मामलों में उन प्रभावशाली लोगों पर छींटाकशी की जाती है, जो सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं।

    Special Interest Sponsored या ऑर्गनाइज्ड ट्रोलिंग

    इस तरह की ट्रोलिंग में पहले से सोची समझी रणनीति के तहत लोगों, कंपनियों या पार्टियों को ट्रोल किया जाता है। उदाहरण के तौर पर एक बार चीन में सोशल मीडिया पर 44 करोड़ पोस्ट सरकारी नीतियों के पक्ष में करवाए गए थे। ये पूरी तरह से प्रायोजित कार्यक्रम था और इसके लिए छुट्टी वाले दिन कर्मचारियों को काम पर लगाया गया ताकि माहौल सरकार के पक्ष में बना रहे।

    ये हैं ट्रोलर्स

    आखिर ट्रोलर्स कौन होते हैं और वे क्यों अपना सारा कामकाज छोड़कर औरों के पीछे पड़े होते हैं ? इसका जवाब देना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि ऐसी कोई कंपनी या ऐसा कोई विशिष्ट व्यक्ति नहीं होता है, जिनके बारे में जानकारी सार्वजनिक हो सके। ऐसे ट्रोलर्स अपना फेक एकांउट बनाकर लोगों को परेशान करते हैं या गलत सूचनाएं फैलाते हैं। कई ट्रोलर्स का मकसद समाज में अटेंशन पाना होता है, तो वहीं कुछ समाज में फैली अव्यवस्था से परेशान होकर भी ट्रोलिंग करते हैं।

    आइडेंटिटी क्राइसिस

    अंग्रेजी में ट्रोल शब्द संज्ञा और क्रिया दोनो रूपों में इस्तेमाल किया जाता है।व्याकरण से परे सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों के लिए ट्रोल का सीधा मतलब सिरदर्द और अपमान है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो जो मानसिकता बिना बात चलती ट्रेन पर पत्थर फेंकने वालों की होती है या पुराने जमाने में ब्लैंक-कॉल करके लोगों को परेशान करने वालों की होती थी, लगभग वही मनोवृति एक ट्रोल की भी होती है। कई मनोवैज्ञानिक इस प्रवृति को आइडेंटिटी क्राइसिस से जोड़कर देखते हैं। पहचान के संकट से जूझ रहे लोग अक्सर ये रास्ता अपनाते हैं ताकि उन्हें समाज का अटेंशन मिल सके।

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