व्यंग्य : तब जाकर कई जन्मों के बाद मूर्खात्य की उपाधि उसे इस जन्म में मिलती है, वह भी कड़े कंपटीशन के बाद

चलायमान दुनिया की चकरघिन्नी से प्रख्यात, विख्यात, के बाद ‘मूर्खात्य’ शब्दोदय हुआ है। न, न मूर्खात्य को एक साधारण उपाधि समझने की भुल न कीजिए। यह एक असाधारण यूं कहें की यह उन भीषणतम उपाधियों में से है जिसे पाने के लिए दिमाग को लॉकडाऊन करके हजारों हजार साल तक मम मुर्खयामि… मम मूर्खादीस्वामी… मम दिमागी दिवालीयामी… मम उल्लूआमी मंत्र का जाप करना पड़ता है। तब जाकर कई जन्मों के बाद मूर्खात्य की उपाधि उसे इस जन्म में मिलती है, वह भी कड़े कंपटीशन के बाद।

दुर्भाग्य यह है कि हमारे ‘राज’ (वाले) नेताओं की लाख कोशिशों के बाद यह उपाधि अमरीका के राष्ट्रविभूति ‘डोरेमनाल्ड’ ट्रम्प कब्जिया ले गयें, वह भी कोरोना भगाओ कंपटीशन में। असल्ल में हुआ ये की दुनिया के देशों को आँख दिखाकर राज करने वाले अमरीका के राष्ट्रविभूति महान वैज्ञानिक ट्रम्प अपने देश में कोरोना का रोना कम करने के लिए एक नई तकनीक इजाद कर दिए हैं। ट्रम्प ने अपने दो ग्राम के दिमाग का प्रयोग करते हुए कहा कि लोगों को अपने शरीर में रोगाणुनाशक इंजेक्ट करने देखना चाहिए। इसके बाद उनकी इस महान सलाह को मानकर 30 अमरिकीयों ने ब्लीच, डेटॉल और लाइजॉल पी लिया।

उड़ती खबर है कि वो बेचारे कोरोना के मारे, रोगाणुनाशक पीने के चक्कर में जहरोना से मरते मरते बचें। अब वह सब ग्लूकोज पी पीकर ट्रम्पू को मुर्खोस रहे हैं। इसके बाद पूरे विश्व के लोगों ने मूर्खात्य उपाधि के लिए जबरदस्त वोटिंग करते हुए डोरेमनाल्ड ट्रम्प को जीता दिया। तो कहना यह है कि हर ओहदेदार महान थोड़े ही है। मूर्खों का कोई दूसरा जहांन थोड़े ही है।

और हाँ, यह मत पूछियेगा की ‘नमस्ते ट्रम्पू’ को नमस्कार करने वाला गुजरात क्यों कोरोना से महाराष्ट्र के बाद ज्यादा पीड़ित है। क्योंकि अमरीकी वहां कोरोना नहीं हलवा पूड़ी बाटने आये थें।