• शक्ति रूपेण संस्थिता : सुनहरे सपनों में स्वविवेक से प्रतिभा ने भरा खुशियों का रंग

    जरूरतमंद बच्चों को साक्षर बनाने के साथ पति के संघर्षों में कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं
    
    तिनका-तिनका जोड़ कर अपने अहसास के आशियाने को खुद तराशा
    
    आज भी उसी तरीके से घर संभालती हैं जैसे शुरुआती दौर में परिस्थितियों को संभाला था

    Special Correspondent

    वाराणसी। कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है। शक्ति आराधना के पर्व नवरात्र पर नौ दिन यही संदेश दिया जाता है। नारीशक्ति की पूजा तो की जाती है लेकिन नारी को बेचारी और अबला का तमगा जबरदस्‍ती थमा दिया गया है। नारी को अबला का नाम ऐसा मिला है कि कई बार वो स्वयं इसे छोड़ना नहीं चाहती। अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा वह आस्था के साथ करती है लेकिन स्वयं की शक्ति पर उसे तनिक भी आस्था नहीं होती। यदि अपने अंदर की शक्ति की नारी स्वयं पहचान कर ले तो नारी देवी रूप ही है। कुछ इसी तरह से खुद की शक्ति पहचान कर सामान्य गृहणी की जिंदगी जीने वाली प्रतिभा पांडेय अपने स्वविवेक के बूते पति उमाशंकर पांडेय के संघर्षों के दौर में कदम से कदम मिलाकर न सिर्फ साथ चलती रहीं बल्कि जरूरतमंद बच्चों को उन्होंने पढ़ाया। उन्होंने खुद के बच्चों को बेहतर तालीम देने के साथ गांव के जरूरतमंद बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दी। प्रतिभा और उमाशंकर ने मिलकर अपने सुनहरे सपनों में खुशियों का रंग भरा।

    चंदौली का अमिलाईं गांव

    दर्द में भी लब मुस्कुरा जाते हैं, बीते लम्हे जब याद आते हैं। हर खास-ओ-आम की जिंदगी से जुड़े कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जिन्हें याद करने के बाद बीत रहे पलों के यादों का कारवां ठिठक जाता है। जिंदगी उतार-चढ़ाव के साथ न जाने कितने रंगों से मुखातिब कराती है। बीते लम्हों की बात भूल पाना नामुमकिन सा होता है। खासतौर से ऐसे में जब आपने तिनका-तिनका जोड़ कर अपने अहसास के आशियाने को खुद से तराशा हो। बात बहुत पुरानी नहीं, 1982 की है। आजादी मिले भले कई साल बीत चुके थे लेकिन उस वक्त लोग अपनी जरूरतों के बंधन से बंध कर गुलाम थें। यह दौर अपने आप में पारिवारिक जरूरतों का इतिहास समेटे था। किस्सा चंदौली जिले के छोटे से गांव अमिलाईं का है।

    जरूरतमंद बच्चों को खुद पढ़ाना शुरू किया

    राजकीय रेलवे पुलिस में दीवान के पद पर तैनात रहे पंडित छविनाथ शर्मा और प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका रहीं मुन्नी देवी शर्मा की बेटी प्रतिभा पांडेय पुरानी यादें साझा करते हुए बताती हैं कि उन्होंने बीते दौर में किन परिस्थितियों में और कैसे घर की जरूरतों को पूरा किया है। बनारस के भारद्वाजी टोला मोहल्ले में रहने वाली प्रतिभा पांडेय बताती हैं, शादी हुए अभी चंद दिन ही हुए थें कि उन्हें पता चला की उनके पति उमाशंकर पांडेय के गांव (अमिलाईं) में रहने वाले हर लोगों के पास खुद की माचिस तो है लेकिन उसकी उपयोगिता बहुत ही जरूरत पड़ने पर की जाती है। शाम के वक्त गांव के किसी भी एक शख्स के घर आग जलने के बाद लोग उस व्यक्ति के घर से गोहरे (ऊपले) पर आग लेकर अपने घर आते थे। उसी के सहारे चूल्हा जलाकर अपने परिवार के लिए खाना बनाते थें। प्रतिभा बताती हैं, तब के दौर में माचिस की एक डिबिया कई महीनों तक चलती थी। लोग एक-दूसरे के घर से किराए की आग लेकर खाना बनाने में संकोच महसूस नहीं करते थे। वह दौर अभाव का था। गांव में शिक्षा को लेकर लोग जागरूक नहीं थे। शादी होने के बाद शून्य से जिंदगी की शुरुआत करने वाले प्रतिभा के पति उमाशंकर पांडेय को बहुत कुछ बनाना था। प्रतिभा ने गांव के लोगों को शिक्षा के लिए जागरूक करने के साथ जरूरतमंद बच्चों को खुद पढ़ाना शुरू किया।

    लोगों ने सोचा नहीं था

    सन 1982 का दौर ऐसा था जब के युवा काम खत्म होने के बाद घर में मिट्टी के तेल (केरोसिन आयल) से जलने वाली डिबरी भी बुझा देते थें। कोयले का कारोबार करने वाले प्रतिभा पांडेय के पति उमाशंकर पांडेय बीते हुए दौर को याद करते हुए बताते हैं कि तब का जामाना बहुत साधारण था। खाना बनने के बाद और लोगों के सोने से पहले घर में जल रही डिबरी को भी बुझा दिया जाता था। मिट्टी के तेल की खपत कम करने के साथ ही तब के दौर में घर की सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहने की जरूरत नहीं रहती थी। पूरी रात अंधेरे में कटने के बाद सुबह-सुबह रश्मि की किरण (सूर्योदय की चमक) के साथ लोग उठ जाते थे। अपने रोजमर्रा के कामों पर लग जाते थें। तब के लोगों ने सोचा भी नहीं था कि बिजली के साथ-साथ आने वाले दौर में इनवर्टर, जनरेटर, सोलर पैनल सहित विद्युत संचार के ऐसे उपकरण प्रचलन में आ जाएंगे। खैर, गांव के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाने के लिए आगे आईं प्रतिभा का पति उमाशंकर पांडेय ने भरपूर साथ दिया।

    गांव से शहर तक का सफर

    प्रतिभा और उमाशंकर पांडेय ने बताया कि उस वक्त गांव में शिक्षा को लेकर लोग बहुत संजीदा नहीं थे। अपना घर देखने के साथ पति-पत्नी ने गांव के बच्चों को साक्षर बनाना शुरू किया। दोनों लोगों के द्वारा पढ़ाए गए कुछ बच्चे सरकारी नौकरी में हैं। कारोबार के सिलसिले में उमाशंकर पांडेय को शहर आना पड़ा। कुछ साल गुजरते-गुजरते उन्होंने पाई-पाई जोड़ कर शहर में मकान बनवाया। सपने के आशियाने को सजाने में प्रतिभा पांडेय ने उनका भरपूर साथ दिया। शहर में रहने के बावजूद आज भी दोनों लोगों का रिश्ता गांव से बरकरार है। उमाशंकर पांडेय की गिनती अब बड़े कोयला कारोबारियों में की जाती है। प्रतिभा पांडेय आज भी उसी तरीके से घर संभालती हैं जैसे उन्होंने शुरुआती दौर में परिस्थितियों को संभाला था।

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