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Webinar : आध्यात्मिकता को हमेशा नीरस व एकांगी माना गया : डा. मंजरी शुक्ला

Varanasi : वसंत महिला महाविद्यालय, अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित पांच दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला के तीसरे दिन मंगलवार को चार व्याख्यान हुए। इस सत्र का संचालन परास्नातक की छात्राओं मेघा यादव व प्रियंका चौहान ने किया। सत्र के प्रथम वक्ता डा. सिद्धार्थ विश्वास (अंग्रेज़ी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने ‘क़यामत और उसके बाद साहित्य मे उत्तरजीविता का सर्वेक्षण’, नामक विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि साहित्य आदि काल से ही मनुष्यों के संघर्ष को दर्शाते हुए जीवन के अंधकार मे प्रकाश भरने का कार्य करती रही है और करती रहेगी। इस सत्र के दूसरे वक्ता के रूप मे डा. मंजरी शुक्ला (अंग्रेज़ी विभाग, वसंत महिला महाविद्यालय) ने ‘मानवता व आध्यात्मिक जागरण कोविड-19 महामारी के बीच ‘ नामक विषय पर बात की। उन्होंने कहा की आध्यात्मिकता को हमेशा नीरस व एकांगी माना गया है। लेकिन जिस तरह की निराशा व ऋणात्मक भावनाएँ बढ़ रही है उसका निदान आध्यमिकता से ही सम्भव है। तीसरी वक्ता डा. शेलि भोईल (कवियत्री व शिक्षाविद, ब्राज़ील) ने ‘निकृष्टतम मे श्रेष्ठ व श्रेष्ठ समय का निकृष्टतम तिब्बती साहित्य और कोविड-91 की राजनीति’, नामक विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कविता इस कठिन दौर मे किसी वैक्सीन से कम नहीं है। उन्होंने कहा की कोविड-19 पर चाइना, अमेरिका व अन्य देशों की बीच राजनीति चल रही है और मानवीय भावनाएँ ख़तरे मे हैं। बुद्ध का दर्शन हमेशा नई दृष्टि देने मे अग्रणी भूमिका निभायी है और कोविड-19 जैसी महामारी के लिए बुद्ध की शिक्षाएँ हमारा मार्ग आलोकित करेंगी।

चौथे वक्ता के रूप मे प्रोफ़ेसर गेरिस हेरंडों (निदेशक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन कार्यक्रम, नेब्रास्का विज़लीयन विश्वविद्यालय, लिंकन, यू एस) ने ‘रवांडा के १९९४ के नरसंहार से सीखते हुए वैश्विक महामारी को जीना’ नामक विषय ओर दृष्टि डाली। उन्होंने कहा कि सभी मानव मनुष्य तो है पर कुछ मानव बेहतर मानव है। चाहे वह कोविड-19 हो या नरसंहार दोनो दुःख त्रासदी व मानसिक आघात जैसी भयावहता से ग्रसित होती हैं। इस विकट परिस्थिति मे मनुष्यया व मानवीय भावनाएँ व संवेदनाएँ हमेशा घावो को भरती रहीं है। इस सत्र के वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन प्रियंका चक्रवर्ती व डा. रचना पांडे ने दिया। इस कार्यशाला मे शामिल हुए प्रतिभागियों ने अपनी मूल रचनाओं के माध्यम से महामारी के वैविध्य रूपों पर अपने विचर रखें। जिसमें अनिशा बिस्वस ने क़ैद सभ्यता, अंशु प्रिया ने वर्षों का दुःख, व अनुष्का सिंह ने अवतार’ जैसी रचनाओं से कार्यशाला को सफल बनाया। इस कार्यशाला मे ७० प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम मे अंग्रेज़ी साहित्य के शिक्षक जैसे की प्रोफ़ेसर अनिता सिंह, प्रोफ़ेसर अलका सिंह, प्रोफ़ेसर बिंदा परंजपे, डा. मंजरी झुनझुवाला ,डा. सौरभ सिंह, डा. रचना पांडेय, डा. सुनीता आर्य , डा. मंजरी शुक्ला, डा. विवेक सिंह, डा. अर्चना तिवारी व प्रियंका चक्रवर्ती ने भाग लेकर त्रितीय दिवस के सत्रों को सफल बनाया।

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