BHU : Covid-19 के मसले पर इंटरनेशनल वेबीनार, कई विदेशी साहित्य चिंतकों ने की शिरकत

Varanasi : साहित्यिक पत्रिका साखी और हिंदी विभाग काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में नेशनल यूनिवर्सिटी सिंगापुर के सहयोग से ‘कोविड-19 की चुनौतियां और साहित्य’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय  वेबीनार का आयोजन हुआ। कोविड-19 से उपजी चुनौतियों से जूझने के लिए वैज्ञानिक, चिकित्सक और अर्थशास्त्री अपने-अपने ढंग से लगे हुए हैं ।प्रश्न है कि साहित्य इसमें क्या करे? इस पर विभिन्न देशों के साहित्य चिंतकों ने विचार दिया।

वेबीनार में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीटर फ्रेडलैंडर ने कहा कि भारत में ऐसी आपदाओं में भी कविता का सहारा लिया जाता है और शब्दों के भीतर जीवन की अमरता का राग गाया जाता है। उन्होंने कबीर, रैदास और तुलसीदास से लेकर नागार्जुन तक की कविता के हवाले से कहा कि ऐसी महामारियों के समय में हमें भूख और गरीबी से पीड़ित सामान्य जनता का दुख भी दिखाई दे जाता है जो अन्यथा नहीं दिखाई देता। इटली के तूरीनो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अलेसांद्रा कौन्सोलारो ने दूसरे विश्वयुद्ध काल के इटैलियन साहित्य का हवाला देते हुए बताया कि आजादी बहुत मूल्यवान वस्तु है। चाहे हम युद्ध के मोर्चे पर जाने को विवश हों या घर में सीमित रह जाने को, दोनों में हमारी आजादी बाधित होती है। ऐसे में साहित्य हमारी आजादी को संभव करता है। वागर्थ पत्रिका के संपादक और विचारक प्रोफेसर शंभुनाथ ने कहा कि यह सिर्फ महामारी नहीं बल्कि सामाजिक बीमारी भी है जिसने पहले से मौजूद इंसान और इंसान के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया है। इसलिए साहित्य को जोड़ने के ऐसे प्रयत्न करने चाहिए जिसमें महा मानवता ध्वनित हो। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुनाफाखोरी से मुक्त करके जन कल्याण में लगाना चाहिए। हिंदी की महत्वपूर्ण कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि इस महामारी ने आदमी के इस गुमान को तोड़ा है कि वह धरती का मालिक है।इससे धरती का भविष्य बेहतर होगा। निष्क्रियता में एक खास तरह का अवसाद विकसित होता है जिसके लिए सकारात्मकता बेहद जरूरी है और वह सकारात्मकता साहित्य के माध्यम से ही संभव है। आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि यह महामारी अभूतपूर्व तो है लेकिन आकस्मिक नहीं है। धरती पर मनुष्य का बर्ताव ही इस बीमारी का जिम्मेदार है। अच्छी बात यह है कि इस महामारी के दौर में मनुष्य का देवत्व प्रकट हो रहा है।

कहा, एक नई दुनिया बनती हुई दिखाई दे रही है जिसमें माटी और मनुष्य की मैत्री संभव है। प्रो. प्रधान ने कहा कि यह समय बीत जाएगा फिर भी साहित्य में इसकी प्रामाणिक गवाहियां दर्ज होंगी। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. सदानंद शाही ने समाहार करते हुए कहा कि साहित्य मनुष्य की बनायी वैकल्पिक दुनिया है। भाषा और शब्दों के सहारे आदमी साहित्य की यह वैकल्पिक दुनिया गढ़ता और उसमें रहता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यह वैकल्पिक दुनिया उसे सहारा देती है और कबीर के शब्दों में ‘हम न मरै मरिहें संसारा’ का संदेश देती रहेगी। कला संकाय की प्रमुख प्रो. रामकली सराफ की से सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया गया। कार्यक्रम का संयोजन (हिन्दी विभाग नेशनल यूनिवर्सिटी सिंगापुर) डॉक्टर संध्या सिंह ने किया। इस वेबीनार में मारीशस, फीजी, श्रीलंका, बांग्लादेश से लेकर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा शातिनिकेतन, वर्धा, पांडिचेरी,  कोलकाता, मुंबई, भोपाल, दिल्ली, इलाहाबाद, आगरा, गोरखपुर, लखनऊ सहित देशभर से तकरीबन एक हजार प्रतिभागियों ने हिस्सेदारी की। धीरज गुप्ता, विश्वमौली, इंदुशेखर त्रिपाठी, राहुल शा तथा आर्यन ने कार्यक्रम को सफल बनाने में तकनीकी सहयोग किया।