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#बतकहीबाज! ‘कोरोना दौर’ में ‘एकला चालो रे’ की ‘विचारधारा’ के ‘विरोधी’

व्यंग्य

भाइयों-बहनों! कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या में इजाफा बदस्तूर जारी है। वायरल इंफेक्शन से परेशान मरीजों को कोरोना का खौफ है। मौसम बदलने से इन दिनों ज्यादातर लोग वायरल फीवर की समस्या से जूझ रहे हैं। सेहत विभाग की ओर से लगातार कहा जा रहा है बुखार, सर्दी आदि-इत्यादि होने पर जांच करवाएं। ठीक इसके उलट, आभासी दुनिया वाले गदर काटे पड़े हैं। दरअसल, फेसबुक को अगर आभासी दुनिया माना जाता है तो फेसबुक पर टैग करने वाले गिरोह को शांति भंग करने वाला असामाजिक तत्व मान लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। असल में, फेसबुक पर टैग करने वाले ‘एकला चालो रे’ की ‘विचारधारा’ के ‘विरोधी’ होते हैं। वह हर काम को समूह में कर सामूहिकता का नेतृत्व कर आभासी दुनिया में असामाजिकता को वायरल करना चाहते हैं। फेसबुक ने लोगों इतना एकाकी बना दिया है कि वह अपने आसपास की दुनिया से बेखबर रह कर केवल अपने न्यूजफिड से खबरें लेते हैं। एकाकीपन को ‘टैग गिरोह’ अपनी कारस्तानी से भंग करता है।

हैप्पी और प्राऊड नहीं फील करता

कोई भी लाइक-कमेंट टपकातुर प्रयोजन हो, ‘टैग गिरोह’ हर मौके पर तबतक हैप्पी और प्राऊड नहीं फील करता जबतक अपनी टाइमलाइन पर 10-15 फोटो पोस्ट कर थोक के भाव में लोगों को टांग न दे, मतलब टैग न कर दे। किसी पोस्ट में टैगीत शख्स ठीक उसी तरह से महसूस करता है, जैसे किसी हैंगर में टंगा हुआ शर्ट। टैग की हुई पोस्ट पर आने वाला हर लाइक और कमेंट ऐसे चिढ़ाते हैं मानो आपके जख्मों पर नमक छिड़क रहे हों। टैग करके ‘टैग माफिया’ आपके वाल की हालत एडवरटाइजमेंट से सजी पब्लिक प्लेस की तरह कर देते हैं।

घोर कलयुग में इंसानियत

डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में इंसानियत पूरी तरीके से खत्म नहीं है। अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने देते हैं। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग इतने भावविभोर हो जाते हैं कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते हैं। कमेंट बॉक्स में ‘थैंक्स फॉर द टैग’ लिखकर टैगीत होने के कर्ज से मुक्त होते हैं। पहले के जमाने में रिश्ते प्रेम के कच्चे धागे से बंधे होते थे। वक्त ने करवट के साथ जब जम्हाई भी ली तो रिश्ते धागों की गांठे खोलकर डिजिटल हुए। …और फेसबुक की वाल्स पर टांग दिए गए। पल्ले पड़ा? 

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