बड़ी बोल 

Guest Writer : जो गुस्ताखियां मुझको नापसंद रही बरसों, उस छेड़खानी को अब हिचकियां तरसती हैं

Banke Banarasi Pankaj अनजान धुन कोई मुझे अलमस्त रखती है, फुर्सत भरी निगाहें यादों से उलझती हैं। जो गुस्ताखियां मुझको नापसंद रही बरसों, उस छेड़खानी को अब हिचकियां तरसती हैं। झूमके बरसता है जब सारा फलक सावन में, दस्त-ए-हिना को उसके दूरियां डसती हैं। किसी की सांसे भी किसी की जिंदगी हो जाती हैं, नन्ही हथेली की छुवन मां का दर्द भुला देती है। पुरजोश वही आलम लौटा दो मुझे ‘बांके’, मजबूरियां दिल की धड़कन भी समझती है। Disclaime नोट- Guest writer कॉलम के जरिए आप भी अपनी बात, शेर-ओ-शायरी,…

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