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Guest Writer : जिम्मेदारी के साथ जरूरतें बढ़ने लगी हैं, ऊंचाइयां कदमों की आहट पढ़ने लगी हैं

Banke Banarasi Pankaj जिम्मेदारी के साथ जरूरतें बढ़ने लगी हैं, ऊंचाइयां कदमों की आहट पढ़ने लगी हैं। ये जिंदगी है इसको खामोश ना कहिए, दूरियां अब नज़दीकियां समझने लगी हैं। कशमकश पालकर सांसे चलेंगी कबतक, इशा़र ए नज़र धड़कन समझने लगी है। इबादत की इजाजत किसी से क्यों मांगू, खुशियां कीमत ए दर्द समझने लगी हैं। कई मर्तबा चलते-2 ठहरा भी हूं ‘बांके’, जबसे कोशिशें रफ्तार समझने लगी हैं। Disclaimer Guest writer कॉलम के जरिए आप भी अपनी बात, शेर-ओ-शायरी, कहानी और रचनाएं लोगों तक पहुंचा सकते हैं। ‘आज एक्सप्रेस’…

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Guest Writer : पहले पढ़ाई सब की थोड़ी अलग सी हो गई, फिर जिंदगी की लड़ाई बहुत अलग हो गई

Banke Banarasi Pankaj पहले पढ़ाई सब की थोड़ी अलग सी हो गई, फिर जिंदगी की लड़ाई बहुत अलग हो गई। लगाव था हम मित्रों में मिलते रहे चौराहों पर, जीवन संगिनीयां कुछ ज्यादा हि अलग हो गई। कोई अमीर कोई मशहूर कोई मगरूर हो गया, आदतें जिंदगी की जाने कब अलग हो गई। फैसले मिलके लेने वाले वो कौन थे कहां गए, उन्हीं हाथों की लकीरें जाने कब अलग हो गई। वही शक्ल देखकर ‘बांके’ कहने लगा आईना, कब जाने कैसे शख्सियत इतनी अलग हो गई। Disclaimer Guest writer कॉलम…

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Guest Writer : गंगयापहृते तस्मिन् नगरे नाग साह्वये, त्यक्त्वा निचक्षु नगरं कौंशांब्याम स निवत्स्यती

पुष्कर रवि शोध छात्रबनारस हिंदू विश्वविद्यालय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्व से स्नात्तकोत्तर अध्ययन के दौरान एक तथ्य पर मेरी नज़र गई। गंगयापहृते तस्मिन् नगरे नाग साह्वये। त्यक्त्वा निचक्षु नगरं कौंशांब्याम स निवत्स्यती॥ ज्ञात हुआ कि इस पौराणिक श्लोक के आधार पर स्व. ब्रज.बासी लाल ने यह मत व्यक्त किया कि जब हस्तिनापुर गंगा की बाढ़ से विनष्ट हो गया तब निचक्षु नामक शासक ने अपनी राजधानी हस्तिनापुर से हटाकर कौशाम्बी में स्थापित किया। इस आधार पर स्व. बी.बी लाल ने सन् 1954-55 के मध्य…

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Guest Writer : जो करोड़ों हैं डकारे अब लें रहे हैं हिचकियां, उनके पीछे-पीछे ईडी-सीबीआई चल रही है

Ratnesh Tiwari Chanchal भक्त और भांटों में जमकर हाथापाई चल रही है, इल्जाम की अंजाम की लीपापुताई चल रही है। ले रही करवट सियासत कुछ लोग ऐसा मानते हैं, सच तो है कि बस सियासी बेहयाई चल रही है। जिसकी लाठी भैंस उसकी ये कहावत है पुरानी, पर यहां लाठी बिना ही मन की मिठाई चल रही है। बहुत दिनों से जो दबी थीं वो खुल रही हैं फाइलें, धूल के मोटी परत की अब सफाई चल रही है। जो करोड़ों हैं डकारे अब लें रहे हैं हिचकियां, उनके पीछे-पीछे…

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Guest Writer : पतझड़ सा बगीचा मेरा तुमने हरा किया है, हर सुकून जीवन का तुम्हारा दिया हुआ है

Banke Banarasi Pankaj मैं तुम्हें देखके जीता हूं तुम मुझे देख कर जीलो, मैं तुम्हें देख मुस्कुराता हूं तुम आंसू मेरे पी लो। पतझड़ सा बगीचा मेरा तुमने हरा किया है, हर सुकून जीवन का तुम्हारा दिया हुआ है, फट सा गया है मन मेरा तुम प्रेम से सी दो। हर रोज नींद मेरी अंगड़ाईयों से लड़ती हैं, तुमसे छणिक दूरी तन्हाई बन मचलती हैं, हर रोज नई दुल्हन बन कर युंही मिलो। ‘बांके’ मेरा नसीब बड़ा मेहरबान है, या तू बड़ा खुशनसीब एक इंसान है, वक्त दे रहा है…

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Guest Writer : तेरी हर शरारत की मुझको खबर रहती है, तेरी जुबां कुछ और नजरें कुछ और कहती हैं

Banke Banarasi Pankaj तेरी हर शरारत की मुझको खबर रहती है, तेरी जुबां कुछ और नजरें कुछ और कहती हैं। जब भी खामोशी सताती है मेरी तन्हाई को, शायद गहरी नींद के आगोश में तू होती है। चंद ख्वाहिशें एहसासों की नज़र कर दो, ज़रूरतें तो जहां में हर शै कि पूरी होती है। फिर वही बिस्तर वही करवट वही सिलवट, तेरी याद बगैर हर सांस अधूरी होती है। मैं उसके ख्वाब में न आऊं वो कह रहा है ‘बांके’, मुझसे लोगों को बड़ी अजीब शिकायतें होती हैं। Disclaimer Guest…

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Guest Writer : कई इल्जाम देखे हैं अल्फाजों की गठरी में बंधे, बेमुरव्वत सताते कई झूठे हाथों को देखा है

Banke Banarasi Pankaj मैंने वक्त और दुनिया बड़े करीब से बदलते देखा है, हजारों अजनबीयों को भी गिरते संभलते देखा है। देखी है भूख कई मर्तबा गश्त लगाती नंगे पाव, शातिर रोटी के टुकड़े को हाथों से फिसलते देखा है। कई इल्जाम देखे हैं अल्फाजों की गठरी में बंधे, बेमुरव्वत सताते कई झूठे हाथों को देखा है। मानुष माटी महिला कहती जुबान देखी है, इंसानियत के लिए लड़ता इंसान देखा है। मैं कई बार चलते-चलते ठहरा भी हूं ‘बांके’, मैंने सांसों को सिक्कों के दम पे चलते देखा है। Disclaimer…

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Guest Writer : वो नस्तर बनके चुभते हैं मेरे साए के होठों में, कभी सुरमे की तेजी बन मेरी आंखें जलाते हैं

Banke Banarasi Pankaj जो कह के आरज़ू ए दिल मुझको मुस्कुराते हैं, वो ख्वाबों में मुझे तस्वीर से बाहर भी लाते हैं। वो नस्तर बनके चुभते हैं मेरे साए के होठों में, कभी सुरमे की तेजी बन मेरी आंखें जलाते हैं। उन्हें अफसोस भी अल्फाज़ से ज्यादा नहीं लगता, जो धड़कन से भी हाल ए दिल अक्सर छुपाते हैं। मैं कैसे किसी चिराग का नूर हो जाऊं, जिसपे फिदा परवाने फना भी हो जाते हैं। मुझे इजहार ए इश्क करना ‘बांके’ नहीं आता, फिरभी मुझे आलिम सभी आशिक बुलाते हैं।…

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Guest Writer : अरसे बाद आईना मेरा नहाया है, खामोश वरना कौन कमज़र्फ रहता है

Banke Banarasi Pankaj याद करने और याद आने में फर्क होता है, किसी किसी को भुलाने में अफसोस होता है। मैं ही दरवाजा क्यों खटखटाऊं उसका, हाल ए मदहोशी में तो वो रोज होता है। बेवजह जिसने मुझे सताया है बहुत, मुझे मालूम है तनहाई में वो भी रोता है। उसका खत बरसों पुराना मैंने है पढ़ा, वो सिर्फ यादों को सिरहाने रखके सोता है। ‘बांके’ अरसे बाद आईना मेरा नहाया है, खामोश वरना कौन कमज़र्फ रहता है। Disclaimer Guest writer कॉलम के जरिए आप भी अपनी बात, शेर-ओ-शायरी, कहानी…

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Guest Writer : लिबासों के बदल जाने पर दिल नहीं बदलते, खामोशी को भी अंदाज़ की जरूरत है

Banke Banarasi Pankaj किसने कहा तुमको सजने की जरूरत है, तुम्हें एक बार सिर्फ हंसने की जरूरत है‌। बज़्म यूंहि है फ़िदा जलवों पे तुम्हारे, यहां न कोई ज्यादा तुमसे खूबसूरत है। पैमा से मीना तक हर कांच में तुम्ही हो, बेबस्त हर आईने में तुम्हारी ही सूरत है। अल्फ़ाज़ ग़ज़ल के मेरे इश्क की गवाही है, तुम्हें मनाने को और किस श़ै की जरूरत है। लिबासों के बदल जाने पर दिल नहीं बदलते, खामोशी को भी ‘बांके’ अंदाज़ की जरूरत है। Disclaimer Guest writer कॉलम के जरिए आप भी…

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