Politics एडिटोरियल 

Editorial : जरूरी है Government और system से question, वरना यह हो जाएगा हाल!

नौ साल पहले जब फ़ेसबुक पर आया था तब फेसबुक मेरे लिए मनोरंजन की चीज हुआ करती थी। मने उस वक्त तक फेसबुक मेरे लिए लिखने का प्लेटफार्म नहीं था। शुरू के एक डेढ़ साल तक तो बस अपनी टूर फोटो,के बाद बस “हाय फ्रेंड कैसे हो”…गुड मॉर्निंग…गुड नाईट ही पोस्ट करता रहा। बाद में लगा कि अपनी बात रखने के लिए यह सोशल प्लेटफार्म पत्र पत्रिकाओं से कमतर नहीं है। इसपर भी अपने विचार रखें जा सकते हैं। सामायिक विषयों राजनीति घटनाक्रमों लिखा जा सकता है। उस वक्त देश में कांग्रेस और प्रदेश में सपा की सरकार थी। बीजेपी केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए संघर्षरत थी।

हम जैसे फेसबुकिये लिखन्तु उस वक्त कांग्रेस और सपा को किसी भी मुद्दे पर घरेने चापने का मौका नहीं छोड़ते थें। मगर मैं बिना तथ्यों के हवा में नहीं लिखता था। जो भी लिखता था उसकी पूरी एनालिसिस करके ही लिखता था। यहाँ तक कि मेरे व्यंग्य लेख में भी सत्यता होती थी।इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी सपोर्टर्स और एंटी कांग्रेस,सपा विचारधारा के फेसबुक मित्रों का जुड़ाव होने लगा। मुझे भी अच्छा लगा क्योंकि उनमें से बहुत से मित्रों से व्यक्तिगत जुड़ाव हो गया।

खैर,2014 में बीजेपी को केंद्र की सत्ता हासिल हुई। मेरे भाजपाई विचारधारा के मित्र खुश हुयें और मैं भी। क्योंकि दो कार्यकाल में कांग्रेस के घोटाले दर घोटाले की परत खुलने से आम जनता जिनमें मैं भी शामिल था,बेहद निराश हो गयी थी। केंद्रीय सत्ता पर काबिज होते ही जनता की निगाहें उन वायदों पर टिक गयीं जिस वादों की पोटली के साथ बीजेपी अपनी चुनावी रैलियों में जाती थी। और मैं उधर से ध्यान हटाकर प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ सपा के उन नेताओं मंत्रियों अधिकारीयों जो भ्रष्टाचार की नदियां बहा रहे थें। मगर मेरे टार्गेट पर कभी अखिलेश यादव नहीं रहें क्योंकि वह वाकई ईमानदार नेकदिल इंसान हैं। उनमें कमियां न पाकर कि उनका मान मर्दन करने के लिए आईटी सेल टोंटी से जोड़ दिया । हां मुख्यमंत्री होने के कारण उनका दायित्व बनता था कि वह ब्यूरोक्रेट्स और मंत्रियों को नियंत्रण में रखें मगर चाचा,बाऊ,ताऊ की बात का मान रखने के लिए उन्हें बहुत कुछ झेलना पड़ा। कमियों की बात करूं तो अखिलेश यादव की दो प्रमुख कमियां मुझे नजर आयीं एक तो जातिवाद, दूसरे उन नेताओं को प्रसय जो बजाय धरातल पर काम करने के बस आसपास घेरा बनाकर जिंदाबाद करते रहें।

खैर, यह दोनों कमियां तो यूपी बिहार में आम है। वर्तमान सत्ताधारी दल के नेता भी इससे अछूते नहीं हैं। विषयांतर न होते हुए यह कहूंगा कि मैं उस वक्त एक साप्ताहिक अखबार में स्थानीय संपादक रहा सपा सरकार की कमियों पर लिखता रहा। इसलिए नहीं कि गैर भाजपाई दल सपा बसपा कांग्रेस से कोई व्यक्तिगत रंजिश हो रही हो। सिर्फ इसलिए कि सरकार और सिस्टम को आईना दिखाना एक पत्रकारीय दायित्व है,चाहे सरकार किसी की भी हो। सीधे शब्दों में कहूँ तो पत्रकार एक “अस्थायी विपक्ष” होता है। जो सत्ताधारी दल के नियत और नीतियों की समीक्षा करता है। उसी हिसाब से लिखता है ताकि जो नीतियां जन सामान्य के लिए बेहतर न हो उसपर सरकार चेत जाय।

मैं यही कहना चाहूंगा कि एक पत्रकार किसी दलीय, जातिगत, धार्मिक निष्ठा से जुड़ा होकर स्वतंत्र रूप से नहीं लिख सकता। इसलिए लोगों को पत्रकारों से यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि वह उनके मनमुताबिक लिखे। और पत्रकारों को भी किसी विषय पर सिर्फ इंसान बनकर लिखना होगा,अपनी व्यक्तिगत निष्ठा को लिखते वक्त ताकपर रखकर ताकि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जीवित रहे। मैं फिर कह रहा हूँ,मैं जब भी सरकार या सिस्टम से सवाल करता हूँ तो मैं यह नहीं देखता की कुर्सी पर बैठा नेता मेरा पसंदीदा है या कोई औऱ मुझे तो सिर्फ प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री ही दिखाई देते हैं। कभी अखिलेश माया, मोदी योगी नहीं। इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सरकार और सिस्टम से बिना किसी व्यक्तिगत सोच के सवाल करते रहिए। वरना लोकतंत्र राजतंत्र में कब तब्दील हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा।

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