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श्रीलंका कांड का समापन : विभीषण नए लंकेश, हुआ राजतिलक, जब श्रीरामजी अयोध्या की ओर चले तो सभी हर्षातिरेक में डूब गये

Sanjay Pandey

Varanasi : कम न थी जानकी मिलन देखने की उत्सुकता। श्रीराम की रावण पर विजय के बाद हर किसी के मन में चाहत थी उस मिलन को देखने के लिए जिसके लिए युद्ध हुआ यानी श्रीरामजानकी का मिलन। तभी तो श्रीराम जी ने सीताजी को पैदल आने के लिए कहा ताकि सभी उन्हें देख सके, लेकिन श्रीरामजी ने सीताजी की अग्नि परीक्षा की बात कहकर सभी को चौंका दिया। मिलन हुआ और साक्षी ब्रह्मलोक व परलोक दोनों बना। विभीषण के राजतिलक के बाद जब श्रीरामजी अयोध्या की ओर चले तो सब हर्षातिरेक में डूब गये। बुधवार को इन्हीं प्रसंगों के साथ श्रीलंका कांड का समापन हुआ।

पालकी में मां सीता आगमन

श्रीराम विभीषण को लंका की राजगद्दी देने के लिए लक्ष्मण सुग्रीव, अंगद, हनुमान को आदेश देते हुए कहते हैं कि पिता के वचनों से बंधा होने के कारण मैं नगर में नहीं जाऊंगा। मेरी ओर से आप सभी जाइए। राजतिलक की सब व्यवस्था से लौटते हैं, तब श्री राम जी हनुमान को सीता से कुशलक्षेम पूछा आने के लिए कहते हैं। पालकी में सीता आती है तो श्री राम कहते हैं कि पैदल लेकर आओ ताकि वानर-भालू भी उन्हें देख सकें। श्री राम सीता से कहते हैं कि तुम धर्म से हो या अधर्म से तुम्हारे संग कि हमें इच्छा नहीं तुम्हें अग्नि से निकलना होगा।

मां सीता की अग्नि परीक्षा

सीताजी के कहने पर लक्ष्मण अग्नि तैयार करते हैं। सीता जी अग्नि से कहती हैं कि मन वचन और कर्म से यदि हमारे मन में श्री राम जी के अलावा किसी का भी विचार ना हो तो आप चंदन की तरह शीतल हो जाओ। अग्नि देव प्रकट होकर सीता का हाथ श्री राम जी को समर्पित करते हैं। देवतागण पुष्प वर्षा कर श्री राम जी की स्तुति करते हुए कहते हैं कि हम नर्क के अधिकारी हैं, स्वार्थ वश आपकी शक्ति भूल गये।

निषादराज से गले मिले श्रीराम

ब्रह्माजी श्रीराम के चरण कमल में प्रीति का वरदान मांगते हैं। दशरथजी स्वर्ग से आते हैं, श्रीराम भाई सहित उनकी वंदना कर आशीर्वाद लेते हैं। शिवजी भी श्रीराम से अपने हृदय में बसने और श्रीराम के राज्याभिषेक में अयोध्या आने का वादा करते हैं। विभीषण पुष्पक विमान ले आते हैं और सभी पुष्पक विमान पर सवार हो अयोध्या के लिए चल देते हैं। पुष्पक विमान निषाद राज के आश्रम पहुंचता है। सीताजी गंगाजी को प्रणाम कर आशीर्वाद देती हैं। निषाद राज सीताजी के चरण में गिर जाते हैं तो श्रीराम उठाकर गले लगाते हैं, यहीं पर आरती होती है।

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