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Exclusive- सहस्त्र दलों वाला कमल सहस्त्रार चक्र का प्रतीक : Varanasi के इस जगह की नर्सरी में सहस्त्र दल कमल का फूल खिला, है दस सर्वोच्च चेतना के रहस्य का चिन्ह, जानिए आध्यात्मिक महत्व

Om Prakash Chaudhari

Varanasi : गढ़वा घाट आश्रम के स्वामी शरणानंद के इच्छा के मुताबिक आश्रम के गार्डन और काशी के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों को खूबसूरत सहस्त्र दल कमल के फूलों से सुशोभित करने के लिए कमल का ट्यूबर्स बैंगलोर के ज्योति एक्वाफार्म से मंगा कर 12 मार्च को रोपित किया गया था। काशी के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल सारनाथ डीयर पार्क, बुद्धा पार्क, मुमुक्षू भवन, BHU के बोटैनिकल गार्डन, विश्वनाथ धाम मंदिर परिसर और अन्य स्थलों पर भी इसे रोपित किया गया था। एक ट्यूबर की कीमत 1200 रुपये है।

दरअसल, सहस्त्रदल कमल फूल में 20 सर्किल और प्रत्येक सर्किल में 50 पंखुड़ी होने से कुल 1000 पंखुड़ी यानी सहस्त्र दल कमल कहलाता है। ढाई महीने बाद सबसे पहले सारनाथ नर्सरी में रोपित सहस्त्र दल कमल का फूल खिला है।

इस फूल के बाहरी पंखुड़ियों को हाथ से फैलाया गया है। ताकि सहस्त्र दल वृद्धि करके एक फीट का आकर्षक फूल खिल सके। इस खूबसूरत पवित्र फूल को निहारते हुए सभी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देगा।

वाराणसी में सहस्त्र दल कमल का फूल रेयरेस्ट ऑफ रेयर फूल मदन राम चौरसिया रिटायर्ड क्षेत्रीय वन अधिकारी के अथक प्रयास, DFO वाराणसी के सहयोग और सारनाथ रेंज के क्षेत्रीय वन अधिकारी पन्ना लाल सोनकर, फॉरेस्टर अमित दूबे और सुरेश माली द्वारा देखरेख करने पर फूल खिलने से अब पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।

आध्यात्मिक खासियत

सहस्त्र पदमा को क्रॉउन चक्र भी कहा जाता है जो सर्वोच्च चेतना और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है। राष्ट्रीय फूल कमल प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति का एक शुभ प्रतीक रहा है जिसके देवी लक्ष्मी का आसन और भगवान विष्णु की नाभि से जन्म होने की पौराणिक मान्यता है। कमल दिव्यता, उर्वरता, धन, कोमलता, दिल और दिमाग की शुद्धता का प्रतीक है। बौद्ध धर्म में कमल शरीर, वाणी और मन की शुद्धता का प्रतिनिधित्व करता है।

इस रहस्य को भी जानिए

संस्कृत के सहस्त्रार शब्द का अर्थ एक हजार होता है। सहस्त्र दलों वाला कमल सहस्त्रार चक्र का प्रतीक है। उसके एक हजार दल यह दर्शाते हैं कि सहस्त्रार की व्यापकता तथा महत्व अनंत है। यह शून्य है। सहस्त्रार का शाब्दिक वर्णन इसलिए असंभव है कि वह शब्दातीत तथा धारणातीत है। वह अनुभव के भी परे है। यहां प्राण और चेतना का परस्पर विलय होता है। यह स्वयं में पूर्ण योग और समस्त योगी का चरम बिंदु है। जब साधक सहस्त्रार को पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर लेता है, तब वह सभी अवस्थाओं से मुक्त हो जाता है। वह सिद्धियों से युक्त, दुख और बंधनों से मुक्त एवं आनंद में स्थित होता है। यदि वह स्वयं को इन सिद्धियों से निर्लिप्त तथा निरपेक्ष रख सके तो वह सर्वज्ञ होता है तथा दस सर्वोच्च चेतना का रहस्य समझा में आ जाता है।

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