Varanasi 

Ground report : कौन करेगा तर्क, वकीलों और मुंशी में नहीं फर्क, एक जैसे पहनावे से असमंजस, पढ़ें वकील ने क्या कहा

Varanasi : यह कहने की जरूरत नहीं है कि ड्रेस कोड आत्मविश्वास, अनुशासन और पेशे का प्रतीक है। एक पेशेवर के रूप में वकील का व्यक्तित्व गौरवशाली होता है। वकील के ड्रेस कोड के मामले में भारत में कई बार मामूली संशोधनों के साथ ब्रिटिश शासन से अपनी विरासत के रूप में हमारे सामने आया है। 1961 का अधिवक्ता अधिनियम, जिमसें वकील के लिए परंपरागत सफेद नेक बैंड के साथ ब्लैक रोब या कोट पहनना अनिवार्य है। वकील की पोशाक का मकसद बेहद उपयोगी होता है। एक तो वकील की पहचान आम लोगों से अलग हो जाती है, जो अदालत परिसर में उसको अन्य से अलग करती है। जब कोई वकील निर्धारित ड्रेस में होता है, तो उसको पहचानने में कोई भी गलती नहीं कर सकता है। एक अधिवक्ता को बाहर निकालने की शक्ति न्यायालय में उपस्थित होना उस पोशाक में निहित निहितार्थ से है, जिसमें निर्धारित पोशाक के पालन को लागू करना होता है। कुछ अपवादों को छोडकर दुनिया भर में काले और सफेद रंग को कानूनी पेशे का प्रतीक माना जाता है।

सकारात्मक पक्ष काला रंग शक्ति को दर्शाता है और सफेद रंग प्रकाश, अच्छाई, मासूमियत और पवित्रता को पेश करता है। इसे विडंबना कहे या भूल की प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के कचहरी परिसर में अधिवक्ता और मुंशी एक जैसे पोशाक में नजर आते हैं। पोशाक सामान्य होने से फरियादी को पता ही नहीं चलता कि कौन अधिवक्ता है और कौन मुंशी। अधिवक्ता के पोशाक में मुंशी भी कचहरी परिसर के अंदर अधिवक्ता बनकर रौब जमाते और सिफारिश करते नजर आते हैं जिससे वास्तविकत अधिवक्ता की छवि धूमिल होती है। काउंसिल की ओर से भी आज तक इस संदर्भ में कभी कोई प्रतिक्रिया या आपत्ति नहीं जताई गई हैं की अधिवक्ता और मुंशी का परिधान अलग हो।

बोले अधिवक्ता

आगामी बार काउंसिल के अध्यक्ष से उम्मीद की जाती है कि वो अधिवक्ता और मुंशी के परिधान की दिशा में कोई ठोस कदम उठायेंगे जिससे अधिवक्ताओं के मान सम्मान को कोई ठेस न पहुंचे। मनीष राय, वरिष्ठ अधिवक्ता, वाराणसी न्यायालय।

इनकी बात

जैसा कि ड्रेस कोड आत्मविश्वास, अनुशासन और पेशे का प्रतीक है, उस हिसाब से कोर्ट परिसर में अधिवक्ता और अन्य कर्मचारियों का अलग-अलग परिधान सुनिश्चित होना चाहिए ताकि यह संदेह न रहे ही कौन अधिवक्ता है और कौन मुंशी। बार काउंसिल के अध्यक्ष को चाहिए कि वो इस दिशा में विचार कर अधिवक्ताओं के गौरव को समझें। कई बार ऐसा होता है मुंशी भी अधिवक्ता के परिधान में कोर्ट परिसर में खुद को वकील बताते हुए रौब जमाते हैं जिससे कि वास्तविक वकीलों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती हैं। अगर अलग अलग ड्रेस कोड निर्धारित हो जाये तो अधिवक्ताओं के हित में होगा।
एडवोकेट नमिता झा, राष्ट्रीय संयुक्त अधिवक्ता मंच भारत के महिला प्रकोष्ठ वाराणसी की महामंत्री।

उनकी बात

कचहरी परिसर में अधिवक्ताओं के साथ-साथ अन्य कर्मियों का ड्रेस कोड एक जैसा होना अधिवक्ताओं के सम्मान के खिलाफ है। ड्रेस कोड समान होने से वास्तविक अधिवक्ता की पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। अगर भविष्य में मुझे अधिवक्ता समुदाय ने कभी अवसर दिया तो हम वकीलों और अन्य कर्मियों के परिधान में बदलाव की दिशा में ठोस कदम उठाते हुए इसे कड़ाई से लागू कराएंगे ताकि कोई वकील के ड्रेस में खुद को अधिवक्ता कह कर फरियादी को छल न कर सके। हम अधिवक्ताओं से भी ये निवेदन करेंगे कि उनके साथ जो सहकर्मी मुंशी के रूप में कार्य कर रहे हो उनका भी रजिस्ट्रेशन जनपद न्यायाधीश के कार्यालय से अवश्य कराएं। न्यायाधीश महोदय से आग्रह है, अधिवक्ताओं की भांति मुंशी को भी अपने कार्यालय से परिचय पत्र जारी करें जिससे कि अधिवक्तओं और मुंशियो के बीच के भ्रम की स्थिति समाप्त हो। अगर ऐसा संभव हो जाता है तो ये अधिवक्ताओं के गौरव को बढ़ाने वाला कदम होगा।
शशिकांत दुबे, एडवोकेट। I

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