बड़ी बोल 

Guest Writer : मुसाफिर हूं अलमस्त बहती हवा सा, हां ठहरने की मुझको आदत नहीं है

कहां मुझको उनसे शिकायत नहीं है, हां हकीकत कहूं ये इजाजत नहीं है।

मुसाफिर हूं अलमस्त बहती हवा सा, हां ठहरने की मुझको आदत नहीं है।

ज्यादती पे अक्सर ही खामोश रहना, हां बुजदिली है कोई शराफत नहीं है।

खिलाफत जरूरी हो अच्छी है लेकिन, हां घुटकर के मरना शहादत नहीं है।

‘बांके’ न औरों से मेरा हाल पूछो, हां कहदो कि अब वो मोहब्बत नहीं है।

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