मेहमान लेखक 

Guest Writer : श़कलें बदल-बदल के थक सा गया हूं मैं, बेअकल के हाथों में क्या किताब दूं

टेढ़े सवालों का क्यों सीधा जवाब दूं, शब ए गम के मारो को क्या गुलाब दूं।

फलसफा बुनता हूं चरागों के धुंए से, मदहोश के हाथों में क्या शराब दूं।

जिनका दिया हर दर्द आदत सा बन गया है, क्या गुस्ताखीयों पे उनकी कोई ख़िताब दूं।

श़कलें बदल-बदल के थक सा गया हूं मैं, बेअकल के हाथों में क्या किताब दूं।

‘बांके’ तेरी हसरत तुझी को मुबारक, किस्मत की बेरुखी का क्या हिसाब दूं।

Disclaime

Guest writer कॉलम के जरिए आप भी अपनी बात, शेर-ओ-शायरी, कहानी और रचनाएं लोगों तक पहुंचा सकते हैं। ‘आज एक्सप्रेस’ की तरफ से Guest writer द्वारा लिखे गए लेख या रचना में कोई हेरफेर नहीं की जाती। Guest writer कॉलम का उद्देश्य लेखकों की हौसला अफजाई करना है। लेख से किसी जीवित या मृत व्यक्ति का कोई सरोकार नहीं। यह महज लेखक की कल्पना है। Writer की रचना अगर किसी से मेल खाती है तो उसे महज संयोग माना जाएगा।

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