बड़ी बोल 

Guest Writer : इंसानियत को रुसवा इंसान ही करता है, आईना पढ़ता नहीं कभी तक़दीर

नई नस्ल की ज़ानिब रखो कुछ तो नई नजीर, आलिम बनो इबरत रखो ऐ अक्ल के फ़कीर।

हरकते जाहिलाना अब भी क्यों जारी रहे, जगता है जग जाने दो अक़्ल का ज़मीर।

उनकी आदतों में तब्दीलियां होने लगी है, आजकल पीटता नहीं वो एक ही लकीर।

ढूंढे से ना मिलेगा एहले जहां में कोई, खुद को न देखना चाहे जो मानिन्द ए मुनीर।

इंसानियत को रुसवा इंसान ही करता है, आईना पढ़ता नहीं ‘बांके’ कभी तक़दीर।

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