मेहमान लेखक 

Guest Writer : छलक जाती है राधा सी मुरलिया श्याम अधरों पर, छनकती छन छनन् पाजेब, इठलाती पवन चंचल

Banke Banarasi Pankaj

निकटता श्याम से ऐसी, मौन भी शोर को आकुल, विष भी बनके इक औषध, जीवनदान को व्याकुल।

सतत् माला घटी-पल की, हो बिखरी चांदनी छल की, मनोहर श्याम बन सूरज, जगा देता है मन गोकुल।

तड़प निश्छल पवन जैसी, उन्मत लहर जल निधि की, प्रेम मीरा के अन्तस सा, भ्रमर सा व्याप्त गुंजन बल।

छलक जाती है राधा सी मुरलिया श्याम अधरों पर, छनकती छन छनन् पाजेब, इठलाती पवन चंचल।

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