Exclusive Varanasi उत्तर प्रदेश धर्म-कर्म 

जीवित्पुत्रिका व्रत आज : गरुड़ देव ने राजा जीमूतवाहन को दिया था जीवन दान, माताओं ने रखा निर्जला व्रत, पढ़ें पूजन विधि और शुभ मुहूर्त

Varanasi: पुत्र दीर्घायु कामना और रक्षा के लिए किया जाने वाला व्रत जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत आज है। माताओं ने अपनी संतान की रक्षा और कुशलता के लिए निर्जला व्रत रखा है। जीमूतवाहन के नाम पर ही जीवित्पुत्रिका व्रत का नाम पड़ा है। ज्योतिषाचार्य पंडित नीलव्रत चतुर्वेदी ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि शाम 06 बजकर 16 मिनट से शुरू हो जाएगा। अष्टमी तिथि का समापन 29 सितंबर को रात 08 बजकर 29 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि होने की वजह से 29 सितंबर 2021 को जितिया का व्रत मनाया जा रहा। ये सबसे कठिन व्रत में से एक होता है। ये व्रत तीन दिन तक चलता है। पहले दिन नहाए खाए। दूसरे दिन निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है। इस बार ये व्रत 28 से लेकर 30 सितंबर तक चलेगा।

पूजन विधि

महिलाएं पुत्र की लंबी उम्र के लिए जीमूतवाहन की पूजा अर्चना करती है।  इस दिन महिलाएं चील और सियार की गोबर से मूर्ति बनाई जाती है।  सबसे पहले जीमूतवाहन भगवान को धूप, दीप, फूल और अक्षत चढ़ाएं. इस दिन चील और सियार की मूर्ति की भी पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत कथा सुनें और बाद में आरती करें। इन दिन पेड़ा, दूब, खड़ चावल, इलायची ,पान, सुपारी चढ़ाया जाता है। महिलाएं जितिया के दिन सरसों के तेल और खली चढ़ाई जाती है। इन चीजों को चढ़ाने से बच्चों को किसी प्रकार की बुरी नजर नहीं लगती है।

व्रत कथा

जीमूतवाहन एक गंधर्व राजकुमार थे, जो बेहद उदार और परोपकारी इंसान थे। उनके पिता ने राजपाट छोड़ दिया और वन में चले गए, जिसके बाद जीमूतवाहन को राजा बना दिया गया। वे राजकाज ठीक से चला रहे थे लेकिन उनका मन उसमें नहीं लगता था। एक दिन वे राजपाट भाइयों को सौंपकर अपने पिता के पास ही वन में चल दिए। वहां उनका विवाह मलयवती नामक ​कन्या से हुआ।एक रोज वन में वे एक वृद्धा से मिले। उसका संबंध नागवंश था। वह काफी डरी और सहमी थी। रो रही थी। जीमूतवाहन की नजर उस पर पड़ी, तो उनसे रहा नहीं गया और उससे रोने का कारण पूछा। उसने बताया कि पक्षीराज गरुड़ को नागों ने वचन दिया है कि हर रोज एक नाग उनके पास आहार स्वरुप जाएगा और उससे वे अपनी भूख शांत कर लिया करेंगे।उस वृद्धा ने कहा कि आज उसके बेटे की बारी है। उसका नाम शंखचूड़ है, चह आज पक्षीराज गरुड़ का निवाला बन जाएगा। यह कहकर वृद्धा रोने लगी। इस पर दयावान जीमूतवाहन ने कहा कि आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। वह आज पक्षीराज गरुड़ के पास नहीं जाएगा। उसके बदले वे जाएंगे। ऐसा कहकर जीमूतवाहन तय समय पर स्वयं गरुड़ देव के पास पहुंच गए। जीमूतवाहन लाल कपड़े में लिपटे थे। गरुड़ देव ने उनको पंजे में दबोच लिया और उड़ गए। इस बीच उन्होंने देखा कि जीमूतवाहन रो रहे हैं और कराह रहे हैं। तब वे एक पहाड़ के शिखर पर रुक गए और जीमूतवाहन को मुक्त किया। तब उन्होंने सारी घटना बताई। गरुड़ देव जीमूतवाहन की दया और साहस की भावना से काफी प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवन दान दे दिया। साथ ही उन्होंने वचन दिया कि आज से वे कभी भी किसी नाग को अपना ग्रास नहीं बनाएंगे। इस प्रकार से जीमूतवाहन के कारण नागों के वंश की रक्षा हुई। इसके बाद से ही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत रखा जाता है।

You cannot copy content of this page