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प्रभु की लीला : दूलहु राम रूप गुन सागर, सो बितानु तिहुं लोक उजागर, अवध में बरात का प्रस्थान और जनकपुर में विवाह

Sanjay Pandey

Varanasi : दूलहु राम रूप गुन सागर, सो बितानु तिहुं लोक उजागर, जनक भवन के सोभा जैसी, गृह-गृह प्रतिपुर देखिअ तैसी। अर्थात जिस मंडप में रूप और गुणों के समुद्र भगवान रामचंद्र दूल्हे होंगे वह मंडल तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। ऐसे में माता जानकी के महल की शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखाई देती है।

रामनगर के विश्व प्रसिद्ध रामलीला के छठे दिन बुधवार को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के विवाह की लीला आयोजित हुई। लीला में बुधवार को अवध में बरात का प्रस्थान और जनकपुर में विवाह कार्यक्रम आयोजित हुआ।

लीला में विश्वामित्र मुनि के साथ गये राम और लक्ष्मण की कोई खबर न मिलने से राजा दशरथ परेशान हो रहे थे। तभी राजा जनक के दूत उनके द्वार पर पहुंचते हैं। दूत उन्हें राजा जनक का पत्र देते हैं। राजा दशरथ पत्र पढ़कर बड़े प्रसन्न होते हैं, दूत उनके पुत्रों के यश, प्रताप और धनुष यज्ञ के बारे में बताते हैं।

इसके बाद राजा दशरथ राजा जनक का पत्र भरत, गुरु वशिष्ठ और तीनों रानियों को पढ़कर सुनाते हैं। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से राजा दशरथ, भरत से बरात की तैयारी करने को कहते हैं। गाजे, बाजे हाथी, घोड़े, रथ आदि पर सवार होकर गुरु वशिष्ठ को साथ लेकर दशरथ बरात लेकर जनकपुर के लिए चल देते हैं।

बारात आने की सूचना पाकर राम और लक्ष्मण, मुनि विश्वामित्र के साथ जनवासे में जाते हैं और अपने परिजनों व गुरुओं से मिलते हैं। शुभ मुहुर्त में चारों भाइयों का विवाह संपन्न होता है। यही पर आरती होने के साथ लीला समाप्त होती है।

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