Education 

पटना High Court का निर्देश lockdown का फीस नहीं ले सकते स्कूल, DM का फैसला उचित

Ajit Mishra

पटना। यह तो व्यक्तिगत ईमानदारी और लाज लिहाज का मामला भी है कि जब तीन महीने प्राईवेट स्कूल खुले हीं नहीं तो वे किस मुँह से बच्चों के अभिभावकों से फीस मांग सकते हैं।हालांकि देखा जा रहा है कि स्कूलों के मनमानी के आगे सरकार और शिक्षा विभाग नतमस्तक हो गया है।अधिकांश स्कूलों में कार्यालय से फिक्स रेट में किताबें बेंची जा रही हैं और बन्दी के समय भी फीस देने के लिये बच्चों के स्कूल से लगातार मैसेज आ रहे हैं।ना फीस माफी और न ही बच्चो के स्वास्थ्य की चिंता।इधर जुलाई से स्कूल खोलने की योजना भी बन रही है।वह भी तब जब प्रतिदिन हजारों की संख्या में कोरोना मरीज़ो बढ़ते ही जा रहे हैं।इसे लेकर अभिभावकों में बेचैनी भी साफ देखी जा रही है।इसी बीच एक अच्छी खबर यह आयी है की पटना हाईकोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूलों के लिए फीस लेने के संबंध में पटना डीएम के निर्देश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।संत पॉल इंटरनेशनल स्कूल की याचिका पर चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने आज सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

हाईकोर्ट ने अपने निर्देश में कहा कि प्राइवेट विद्यालयों को अगर ज्यादा परेशानी है तो वे डीएम एवं आपदा प्रबंधन के प्रधान सचिव के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं। सक्षम अधिकारी विचार कर 4 सप्ताह में उचित निर्णय लेंगे। जानकारी हो कि पटना के डीएम ने कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन में बंद रखे गए प्राइवेट स्कूलों पर 10 अप्रैल को आदेश जारी किया था। इसमें विद्यालयों के प्रबंधकों से कहा गया था कि वे अभिभावकों से 3 महीने का नहीं बल्कि सिर्फ एक महीने का हीं ट्यूशन फीस ले सकते हैं। इसके अलावा वे अन्य प्रकार के भी चार्ज नहीं ले सकते।बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने के लिए व्हाट्सएप, ईमेल आदि की सुविधाएं भी उन्हें देना होगा।उनके स्कूल में जो अध्यापक,कर्मचारी एवं अन्य स्टाफ हैं उन्हें वेतन देने में कटौती भी नहीं कर सकते हैं। संत पॉल इंटरनेशनल स्कूल ने याचिका दायर कर जिला प्रशासन के आदेश को रद कराने की मांग की थी।लेकिन हजारों अभिभावकों के लिये खुशी की बात है कि कोर्ट ने उन्हें फिलहाल कोई राहत नहीं दी है।ग़ौरतलब है कि राज्य के कई स्कूलों में कई अध्यापकों को स्कूलों से बिना कारण जबरन हटा देने की भी खबरें प्राप्त हो रहीं हैं।वहीं बच्चों की फीस से हीं खड़ी गगनचुम्बी इमारतें और करोड़ों के बैंक बैलेंस वाले स्कूलों के पास इतने पैसे भी नहीं है कि वे आपदा के समय अपने अध्यापकों का भरण पोषण कर सकें। जब फीस माफ करने का मामला आया तो स्कूल प्रबंधक पूरे बेहयाई के साथ फीस लेने पर अड़े हुए हैं। सवाल है कि न अपने अध्यापकों से न्याय और ना हीं अभिभावकों को राहत देने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द क्यों नहीं कर दी जा रही हैं। इस बीच अभिभावकों का यह भी आरोप है कि काली कमाई को लेकर मंत्री,शिक्षा अधिकारी और स्कूल प्रबंधन के बीच कोई खिचड़ी जरूर पक रही है।

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