एडिटोरियल बड़ी बोल 

बतकहीबाज : … सिर्फ जिंदा रहे तो मर जाएंगे

प्री मानसून शुरू। बरसात हुई। मौसम खुशगवार हो गया। शहर के अधिकांश गड्ढे तालाब में तब्दील हो चुके हैं। कोरोना की पंचायत भी चल रही है। खुद को सुरक्षित रखना है। अपनों को बचाना है। तब्दील हुए मौसम का लुफ्त उठाने के साथ रोजमर्रा की चीजें को इकट्ठा कराना भी जरूरी है। मिडिल क्लास फैमिली के साथ अवसर कम, परेशानियां ज्यादा चिपकी होती हैं। हाल-ए-संकट ऐसा की रोज कमाने-खाने वाला बंदा मानो बंदर बन गया है। न्यूज चैनल्स देखने पर लगता है सब खत्म हो गया। कुछ नहीं बचा।

झंझटों के बीच

सभी झंझटों के बीच, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो आपके न चाहते हुए भी अपनी तरफ आपको अट्रैक्ट करते हैं। हालात जो भी हों, वह इतना उछल-कूद मचा देंगे कि उनकी तरफ बिन आकर्षित हुए आप थम ही न पाएंगे। उन्हें मतलब बस इससे होता है कि उनकी तरफ कोई देख क्यों नहीं रहा है। देखा तो देखा, बनारसी अंदाज में बात क्यों नहीं कर रहा है।

जीनियस और हीनियस

गलतफहमी में कभी-कभी इस टाइप के लोग तार गलत छेड़ देते हैं। देखिए, व्यस्तता मिडिल क्लास फैमिली की अपनी जगह है। आइक्यू लेवल अपनी जगह। जैसा कि लोग बताते हैं, जीनियस और हीनियस में अंतर नहीं होता। लोगों की सोच अपनी जगह है! फिलवक्त, सिर्फ जिंदा रहे तो मर जाएंगे। पढ़ते रहिए, सोचते-समझते रहिए, अपने ब्लॉग बातूनी Warrior के लिए मैं अक्सर खुरपेच (मौज का साधन खोजता रहता हूं) करता रहता हूं। बने रहिए मेरे साथ।

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