एडिटोरियल बड़ी बोल 

व्यंग्य : ‘आधार कार्ड’ दिखाकर ‘घर’ में ‘Entry’ पाने वाले भी ‘WhatsApp group’ के ‘Admin’

बतकहीबाज

भाइयों-बहनों! व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की कहानी किसी से छुपी नहीं। हर वो शख्स व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की माया से वाकिफ है जो स्मार्टफोन इस्तेमाल करता है। ज्यादातर वही लोग व्हाट्सएप ग्रुपों के एडमिन बन कर क्रांति पताका फहरा रहे हैं जो क्लासरूम में मुर्गा बना करते थे। कई व्हाट्सएप ग्रुपों के मैसेज ‘सुरेश-रमेश’ से भी मिलते-जुलते हैं। अरे! आप ‘सुरेश-रमेश’ को नहीं जानते? फाइव स्टार चॉकलेट वाले बंदे याद हैं न? पकड़ तो लिया आपने। वैसे! जानकरों का मानना है, इन सभी ग्रुपों को मिलाकर किताब बने तो उसका नाम ‘कॉपी-पेस्ट’ रखा जा सकता है।

उनके लिए क्या कहेंगे?

अबतक खबरों से लगायत कई मसलों को लेकर कई व्हाट्सएप ग्रुप बन गए हैं। जिस तेजी से करीब हर तीसरा बंदा व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर एडमिन बनता जा रहा है, उस हिसाबन आने वाले दौर में आम आदमी खोजने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। समझना चाहिए, व्हाट्सएप ग्रुप बनाना इतना बड़ा नैतिक अपराध नहीं जितना पब्लिक फिगर होते हुए भी (खुद को समझते हुए भी) दूसरों को ग्रुप में ऐड कर लेना। अगर ऐसे लोग भी एडमिन बन जाएं जिन्हें घर में इंट्री आधार कार्ड दिखाने पर मिलती हो तो उनके लिए आप क्या कहेंगे?

गाइडलाइन कौन मानेगा?

अपने को नेता मानने वाले भी इससे पीछे नहीं। नेतागिरी वाले व्हाट्सएप ग्रुपों में ऐड होने के बाद लगता है, नेता बनने के लिए किसी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेना जरूरी नहीं। और तो सबकुछ ठीक है लेकिन, अगर वह लोग भी व्हाट्सएप ग्रुप एडमिन बनकर लीडर बन रहे हों जिनका खुद का नाम वोटिंग लिस्ट में न हो तो इंसानियत के साथ टेक्नोलॉजी पर से भी भरोसा उठ जाता है। खैर, कोविड का दौर चल रहा है। सतर्क रहें, सरकारी गाइडलाइन का पालन करें। व्हाट्सएप ग्रुप का नहीं, अपना और अपनों का ख्याल रखें।

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