Varanasi धर्म-कर्म 

शारदीय नवरात्र : मां चंद्रघंटा की आराधना कर निहाल हो रहे भक्त, पढ़ें पूजन करने का महत्व और पौराणिक कथा

Varanasi : शारदीय नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्री और दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी देवी के दर्शन करने के बाद तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। सोमवार को तृतीय दिवस पर चित्रघंटा गली (चौक) स्थित मां चंद्रघंटा मंदिर में दर्शन पूजन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ी। मां का दर्शन कर भक्त निहाल हो रहे। माला-फूल, नारियल हाथ मे लिये भोर से ही भक्तों की कतार लगी रही। मां के जयकारे गूंजते रहे। भोर में पट खुलने के बाद दर्शन का क्रम चलता रहा। भीड़ से इलाके में जाम की स्थिति बनी रही। कोरोना महामारी से बचाव को ध्यान में रखते हुए भक्त सोशल डिस्टेंसिंग के साथ दर्शन-पूजन कर रहे।

इससे पूर्व मंदिर के महंत धर्मेन्द्रनाथ योगेश्वर के आचार्यकत्व में पुजारी वैभव योगेश्वर ने मां को पंचामृत स्नान कराने के बाद नवीन वस्त्र व आभूषण धारण कराया। विविध सुगंधित फूलों व पंचमेवा से शृंगार हुआ। मां को पसंद दूध के बने मिष्ठान का भोग लगा। मंगला आरती के बाद मंदिर का पट खुलते ही जयकारे के साथ दर्शन शुरू हो गया। दर्शन के लिए आसपास की गलियों में लाइन लगी रही।

पूजन का महत्व

नवरात्रि का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का होता है। इस दिन मां के चंद्रघंटा स्वरूप की उपासना की जाती है। इनके सिर पर घंटे के आकार का चंद्रामा है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है। मां चंद्रघंटा तंभ साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से होता है।

यह है पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा तो मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लिया। उस समय असुरों का स्वामी महिषासुर था जिसका देवताओं से भंयकर युद्ध चल रहा था।  उसकी प्रबल इच्छा स्वर्गलोक पर राज करने की थी। उसकी इस इच्छा को जानकार सभी देवता परेशान हो गए और इस समस्या से निकलने का उपाय जानने के लिए भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामने उपस्थित हुए। देवताओं की बात को गंभीरता से सुनने के बाद तीनों को ही क्रोध आया। क्रोध के कारण तीनों के मुख से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई। उससे एक देवी अवतरित हुईं। जिन्हें भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अपने अस्त्र सौंप दिए। देवराज इंद्र ने देवी को एक घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार दी, सवारी के लिए सिंह प्रदान किया। इसके बाद मां चंद्रघंटा महिषासुर के पास पहुंचीं। मां का ये रूप देखकर महिषासुर को ये आभास हो गया कि उसका काल आ गया है। महिषासुर ने मां पर हमला बोल दिया। इसके बाद देवताओं और असुरों में भंयकर युद्ध छिड़ गया। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार किया। इस प्रकार मां ने देवताओं की रक्षा की।

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