Health Varanasi 

विश्व स्तनपान सप्ताह पर विशेष : CMO बोले- मां का दूध शिशु के लिए सर्वोपरि, डिब्बा बंद दूध से बच्चे को रखें दूर, प्रचार-प्रसार में जुटीं कंपनियों के खिलाफ आईएमएस एक्ट के तहत हो सकती है कार्रवाई

Varanasi : दो वर्ष तक के बच्चों के लिए मां का दूध ही सर्वोपरि है। इस दौरान डिब्बा बंद दूध देने से बच्चे की सेहत पर गलत असर पड़ सकता है। शिशु दूध विकल्प अधिनियम 1992 और संशोधित अधिनयम 2003 (आईएमएस एक्ट) के तहत लोगों को मुफ्त में डिब्बाबंद दूध देकर अपने प्रचार-प्रसार में जुटीं कम्पनियों के खिलाफ पूर्व से ही कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह कहना है मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. संदीप चौधरी का। उन्होने कहा कि जनपद में एक से सात अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जा रहा है, जिसके तहत जन्म के पहले घंटे के अंदर मां का गाढ़ा पीला दूध पिलाना, छह माह तक सिर्फ स्तनपान और मां (मदर्स एब्सोल्यूट अफेक्शन) कार्यक्रम के प्रति जनजागरूकता के हरसम्भव प्रयास किये जा रहे हैं।

कबीरचौरा स्थित जिला महिला चिकित्सालय में संचालित एसएनसीयू की प्रभारी एवं वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मृदुला मल्लिक ने कहा कि आजकल बहुत सी माताएं अपने शिशुओं को डिब्बाबंद दूध और सामग्री का सेवन कराती हैं। वह ऐसा इसलिए करती हैं कि उनको लगता है कि दूध नहीं बन रहा है और यह डिब्बाबंद दूध उसके लिए बेहतर विकल्प है। लेकिन यह सच नहीं है, शिशु यदि पूरे दिन में छह से आठ बार पेशाब और लेट्रिन कर रहा है और हर दो से तीन घंटे में दूध पी रहा है तो उसे पर्याप्त मात्रा में मां का दूध मिल रहा है। शिशु का पहला आहार और टीकाकरण के रूप में मां का दूध ही सर्वोत्तम होता है। उन्होंने कहा कि डिब्बाबंद दूध शिशु की सेहत के लिए नुकसानदेह है। इसमें प्रिजर्वेटिव मिला रहता है, जो कि प्रोटीन, कैल्शियम व विटामिन को खत्म कर देता है। इससे शिशु की हड्डियां कमजोर होती हैं।

डिब्बा बंद दूध से आती है कमजोरी

डॉ. मृदुला ने कहा कि यूनीसेफ, डब्ल्यूएचओ के अनुसार मां का दूध बच्चों में डायरिया, निमोनिया और कुपोषण से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यूनीसेफ का मानना है कि डिब्बा बंद दूध के प्रयोग से ऐसे परिवार धीरे-धीरे कृत्रिम दूध और आसानी से उपलब्ध विकल्पों का सहारा लेने लगते हैं जिससे शिशु मां के दूध से वंचित रह जाते हैं। इससे मां के आत्मविश्वास में कमी और बच्चों में कमजोरी आती है। डब्ल्यूएचओके अनुसार स्तनपान, मोटापा एवं बाद में होने वाले उच्च रक्तचाप व दिल संबंधी रोगों को अपेक्षाकृत कम करता है।

छह माह तक सिर्फ स्तनपान

डॉ. मृदुला ने कहा कि जन्म के पहले घंटे केअंदर मां का गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) शिशु के लिए अमृत के समान होता है। उसमें अनेक पौष्टिक तत्व होते हैं, जो शिशु को संक्रमण से बचाने के साथ प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। छह माह तक शिशुओं को मां के दूध के अलावा और कुछ भी नहीं दिया जाना चाहिए। इससे रोग प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है। मां के साथ शिशु का लगाव भी बढ़ता है। दो वर्ष तक मां के स्तनपान के साथ ऊपरी आहार देने से बच्चों का शारीरिक, मानसिक विकास तीव्र गति से होता है। स्तनपान से शिशु और मां की सेहत बेहतर रहती है। मां का दूध शिशु के लिए सुपाच्य होता है।

शिशु और मां को कई बीमारियों से बचाता है स्तनपान

नियमित रूप से स्तनपान से महिलाओं को मोटापा, बच्चेदानी और स्तन कैंसर का खतरा कम होता है। सर्दी जुकाम या कोई भी बीमारी होने पर मां को शिशु को स्तनपान कराना बंद नहीं करना चाहिए। इस दौरान बच्चे को किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या हो रही है तो तत्काल नजदीकी सरकारी चिकित्सालय जाकर डॉक्टर और विशेषज्ञ के सलाहनुसार ही शिशु का उपचार कराना चाहिए।

क्या बताते हैं एनएफएचएस के आंकड़े

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वेक्षण 4 (एनएफएचएस 2015-16) के अनुसार जिले में 18.3 फीसदी जन्मे शिशुओं को एक घंटे के अंदर स्तनपान कराया गया जबकि एनएफ़एचएस-5 (2019-21) में बढ़कर 36.5 प्रतिशत हो गया है। एनएफएचएस-4 में छह माह तक के 23.5 फीसदी बच्चों के सिर्फ स्तनपान कराया गया, एनएफएचएस-5 में बढ़कर यह 47.5 % हो गया है। एनएफएचएस-4 में छह से 23 माह तक के 4.8 % बच्चों को स्तनपान के साथ अनुपूरक मिला वहीं एनएफ़एचएस-5 में यह बढ़कर 6.6 % हो गया है।

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