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न्याय के दो पैरों ने अन्याय के 10 सिर कुचला : हर ओर श्रीराम की जय-जयकार, मारा गया रावण, मंदोदरी से बोला था- हार भी गया तो जीत मेरी ही होगी

Varanasi : युद्ध छिड़ने के बाद मंदोदरी के समझाने पर रावण ने कहा था- अगर मेरी मौत भगवान के हाथ से लिखी है तो उसे कोई नहीं टाल सकता है। मैं जिंदा रहूं या मारा जाऊं दोनों हाल में जीत मेरी ही होगी।

अगर मैं युद्ध जीत गया तो लोग मुझे विजेता कहेंगे। अगर मारा गया तब भी इतिहास मुझे नहीं भूल पाएगा। जब-जब राम की चर्चा होगी तब-तब रावण को याद किया जाएगा।

भगवान के हाथ से मोक्ष पाना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। इतिहास मुझे कायर नहीं कहेगा।

… और अतंत वह घड़ी आ ही गई जिसका समय और काल को इंतजार था। जिस पल के लिए देवताओं में बेकरारी थी। न्याय के दो पैरों ने अन्याय के 10 सिर को कुचल दिया।

दरअसल, जिसके लिए श्रीराम वन आए थे और जिस पल का युगों-युगों से सबको इंतजार था वह छड़ आ गया। रावण के अहंकार ने उसका सर्वस्व छीन लिया था। रोने को भी कोई नहीं बचा।

रामलीला के छब्बीसवें दिन के प्रसंग में रावण अपने सारथी को डांटता है कि तुमने रणभूमि छुड़ाया। वह युद्ध करता है और कई तरह का माया दिखाता है।

यह सब देख विभीषण श्रीराम को रावण की नाभि में तीर मारने को कहते हैं। श्रीराम उसके नाभि में तीर मारते हैं और रावण के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। विभीषण रावण की मृत्यु पर विलाप करते हैं।

श्रीराम विभीषण से शोक छोड़ रावण की अंत्येष्टि करने को कहते हैं। विभीषण रावण को मुखाग्नि देते हैं। रावण का शरीर धूं-धूं कर जलता है और राख हो जाता है।

उसकी आत्मा उसका शरीर छोड़ दूसरे दुनिया का रुख पकड़ लेती है। इसी के साथ पूरा माहौल राममय हो जाता है। चारों ओर श्रीराम की जय-जयकार होने लगती है। यहीं पर आज की आरती होती है।

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