Varanasi 

Varanasi : अखण्ड भारत के पहले राष्ट्राध्यक्ष थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

नेताजी की अगुवाई में आजादी मिलती तो देश विभाजन का दर्द नहीं झेलता- इंद्रेश कुमार

Ajit Mishra

Varanasi : आजाद हिन्द सरकार की स्थापना दिवस के अवसर पर सुभाष मंदिर में विशाल भारत संस्थान द्वारा आयोजित आरती एवं सलामी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार ने सुभाष की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया एवं सुभाष मंदिर की पुजारी खुशी रमन, पंडित अनुज पाण्डेय एवं पंडित प्रदीप शास्त्री ने वैदिक रीति रिवाजों के द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ भव्य आरती करायी। आजाद हिन्द बाल बटालियन ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को सलामी दी। सुभाष कथा सनायी एवं आजाद हिन्द सरकार का राष्ट्रगान गाया। दुनिया के सभी महापुरूषों में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को ही रूहानियत, आध्यात्मिक दर्जा प्राप्त है इसलिये दुनियां भर के सुभाषवादी नेताजी सुभाष को परम पावन राष्ट्रदेवता के रूप में पूजते हैं। सुभाष मंदिर प्रतिदिन सुबह शाम पूजा, अर्चना और आरती की जाती है। प्रत्येक भारतीयों का यह मानना है कि यदि सुभाष होते तो देश नहीं बंटता।

इन्द्रेश नगर के सुभाष भवन में आजाद हिन्द सरकार योगदान, नीतियां एवं कार्य विषयक वैचारिक राष्ट्र विमर्श का आयोजन किया गया। जिसमें सुभाषवादी विचारकों, इतिहासकारों और समाज चिन्तकों ने आजाद हिन्द सरकार की 77वीं वर्षगांठ पर चर्चा की। द्वितीय विश्व युद्ध में फंसे अंग्रेजों के लिए सबसे कठिन चुनौती नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने खड़ी की। पूरी दुनियां को अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार से परिचित कराया और भारत की आजादी की अनिवार्यता का प्रचार किया। 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में अस्थायी आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की। इस सरकार के मंत्रीमण्डल में प्रधानमंत्री, कार्यकारी प्रमुख युद्धमंत्री और सर्वोच्च सेनापति नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे। बाल कल्याण मंत्री डा. लक्ष्मी स्वामीनाथन, प्रचारमंत्री एसए अय्यर, वित्तमंत्री एसी चटर्जी, कानूनी परामर्षदाता करीम गनी थे।

अस्थायी आजाद हिन्द सरकार को विश्व के 9 देशों जापान, बर्मा, क्रोशिया, जर्मनी, राष्ट्रवादी चीन, मंचूको, इटली, थाइलैण्ड और फिलीपिन्स ने मान्यता प्रदान की थी। 30 लाख प्रवासी भारतीयों ने आजाद हिन्द सरकार के कोष के लिये अपनी सम्पत्ति दान कर दी। जिससे अंग्रेजी हुकूमत को बड़ी चुनौती मिली और देश को आजाद करना पड़ा, लेकिन अपने निहित स्वार्थ में सत्ता के लालच में नेहरू और जिन्ना ने देश को बांट दिया और 40 लाख से ज्यादा लोग मारे गये और बेघर हो गये।

इस अवसर पर संगोष्ठी में सुभाषवादी विचारक तपन कुमार घोष ने कहा कि आजाद हिन्द सरकार ने सिर्फ अखण्ड भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त नहीं किया बल्कि आजादी के बाद की भारत के विकास की योजनाओं का खांका भी खींचा। पंचवर्षीय योजना से लेकर राष्ट्रभाषा हिन्दी ही हो ऐसी योजना सुभाष सरकार की ही थी। जय हिन्द का अभिवादन देकर देश को हिन्दू-मुसलमान के भेद से ऊपर उठाया और एक करने का दर्शन दिया। सूत्र वाक्य एकता, विश्वास, त्याग ने नागरिकों को देश के साथ जीने का मंत्र दिया। आजाद हिन्द सरकार ने ही देश को आजाद कराया और सुभाषवाद ने राष्ट्रभक्ति का दर्शन दिया। इतिहासकारों ने एक परिवार के इतिहास के लिए सुभाष के इतिहास के साथ अन्याय किया। इतने वर्षों के बाद भी प्रत्येक भारतीयों के मन मस्तिष्क में सुभाष के नारे गूंज रहे हैं।

मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार ने कहा कि ‘सुभाष का दर्शन अखण्ड भारत का था। सुभाष को पता था कि अंग्रेज जाते समय देश का विभाजन कर सकते हैं, इसके लिए उन्होंने गांधी को चेताया भी था। लेकिन अंग्रेजों की कूटनीति का जवाब देने वाले सुभाष की अनुपस्थिति ने विभाजन का माहौल बना दिया और उस समय कोई ऐसा नेता नहीं था जिस पर हिन्दू और मुसलमान एक समान भरोसा करें, सिवाय सुभाष के। आजाद हिन्द सरकार का योगदान हजारों सालों तक गुलाम देशों की आजादी के लिये प्रेरणा बनता रहेगा। सुभाष की वजह से भारत का गौरवपूर्ण इतिहास बना, लेकिन इतिहासकारों ने सुभाष के साथ न्याय नहीं किया। सुभाष होते तो देश विभाजन का दर्द नहीं झेलता।

संगोष्ठी में विशाल भारत संस्थान के अध्यक्ष इतिहासकार डा. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि ‘हर सुभाषवादी अखण्ड भारत की आजादी चाहता था। विभाजन तो किसी ने सपने में नहीं सोचा था। लाखों लोगों की लाश पर नेहरू और जिन्ना को सत्ता मिली। आजादी की खुशी मनाने के लिए दो महान सेनानी गांधी और सुभाष शामिल नहीं हुये। गांधी नोआखाली में दंगा शांत कराने चले गये और सुभाष का पता नहीं चला। नेहरू परिवार के इतिहास को संरक्षित करने और देश की आजादी में बड़ी भूमिका बताने के लिये सुभाष चन्द्र बोस के इतिहास को मिटाने का प्रयास किया गया। सुभाषवाद के प्रचार से ही राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता सुरक्षित रह सकती है। संयुक्त परिवार चल सकते हैं समाज में एकरूपता आ सकती है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए श्रीराम आस्थावादी चिंतक चट्टो बाबा ने कहा कि इतिहास ने सुभाष की उपेक्षा की है और सुभाष की उपेक्षा राष्ट्रवाद की उपेक्षा है क्योंकि जिनके नेतृत्व में आजादी मिली उनको राष्ट्रवाद और आस्थावाद से खतरा महसूस हुआ इसलिये उन्होंने सेकूलर भारत बनाया जिसका खामियाजा हम आज भुगत रहे हैं। सुभाष के दर्शन में राम राष्ट्र और रोटी तीनों की अभिव्यक्ति थी और यही अभिव्यक्ति भारत की सम्पूर्ण व्याख्या है।
संगोष्ठी का संचालन अर्चना भारतवंशी ने किया और धन्यवाद मो. अजहरूद्दीन ने दिया।

इस कार्यक्रम में पं. ऋषि द्विवेदी, आत्म प्रकाश सिंह, रमेश शर्मा, आनन्द मिश्रा, अभिजीत बिसेन, प्रो. एसपी सिंह, डा. निरंजन श्रीवास्तव, नाजनीन अंसारी, नजमा परवीन, डा. मृदुला जायसवाल, सुनीता श्रीवास्तव, मो. अजहरूद्दीन, धनंजय यादव, उजाला, शालिनी, दक्षिता भारतवंशी, रोजा, तबरेज, राशिद आदि लोगों ने भाग लिया।

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