Varanasi 

Varanasi : ‘बेटा पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ है हमारा नया नारा, नजरंदाज करने का अंदाज नहीं चलेगा- प्रियादीप

Varanasi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्मानित लेखिका प्रियादीप कौर ने कहा कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ हमारे ग्रंथो में हमने नारी को सर्वोपरी पाया है। कहते हैं, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। आज के समय में असंस्कृत लोगों के कारण नारी शक्ति को अब सशक्तिकरण की जरूरत महसूस हो रही है। हाथरस में हुई घटना की खबर सुनकर तकलीफ होती है। क्योंकि, राष्ट्र के विकास के लिए एक तरफ जहां परेंट्स अपनी बेटियों क़ो पढ़ाने, अपने सपने पूरे करने के लिए जागरुक हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गुन्हेगारी प्रवृत्ती के कार्यों के कारण महिलाओं को अकेले निकलने में भी कहीं न कही डर महसूस होता हैं। ये हमारे भारतवर्ष के लिए किसी विडम्बना से कम नहीं हैं।

बताया, मेरी आई पुस्तक ओस्कर फोर लविंग ग्रेमी फोर नोट में भी एक ऐसा किस्सा हैं जो की मेरे पाठकों को यें मेसेज देने के लिए ही लिखा गया है की उन्हें आवाज उठाने की जरूरत हैं। जैसे-जैसे देश में महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहा है, जनता का आक्रोश देखने को मिलता है, लेकिन आक्रोश से हमारे अंदर कोई परिवर्तन न आए तो शोशल मीडिया पर पोस्ट डाल देने से क्या कोई फायदा हैं?

बोलीं, जब तक वुमनाईजिंग मिम्स और जोक्स सरकुलेट होते रहेंगे, महिला शशक्तिकरण की शुरुआत ही होना मुश्किल है। शायद यही कारण हैं कि ऐसे गम्भीर विषय को मजाक बना दिया गया है। कुछ साल पहले यहां महिलाओं को सामान्य फैसलों, आय, तथा सामाजिक स्तर में भी बराबरी नहीं थी, हमने राष्ट्र के विकास को समझते हुए महिलाओं का महत्त्व और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाई हैं। लेकिन अब बात सुरक्षा की हैं, तो हमें इसे पुरुष या महिला बनके नहीं बल्कि इंसान बनकर करनी होगी।

कहा, ताज्जुब की बात हैं की मां के मूल्यों को मानने वाले इस देश में राक्षसी सोच के लोग भी बढ़ रहे हैं। इसीलिए हमें नजरंदाज करने का अन्दाज अब बंद करना होगा। शुरुआत करें, इग्नोरेंस को किसी बड़ी दुर्घटना का कारण न बन ने दें।

बताया, दहेज प्रथा, अशिक्षा, दुष्कर्म, असमानता, महिलाओं के प्रति घरेलू अत्याचार से लड़ने से बेहतर है की हम इसे भीतर से खत्म करें। जरूरत है तो आवाज उठाने की और नजरिया बदलने की। सीएम के प्रोजेक्ट मिशन शक्ति के बारे मे पढ़कर होपफुल हूं कि हम चाहें तो मिलकर बदलाव ला सकते हैं, उत्तर प्रदेश को महिलाओं क्या सबके लिये उत्तम-प्रदेश बना सकते हैं।

उन्होंने कहा, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ से अधिक हमें बेटा पढ़ाओ बेटी बचाओ के नारे पर फोकस करना ही होगा। बचपन से ही लड़कों को सिखाया जाता है की लड़के रोते नहीं हैं, लड़कियां रोती हैं। जो की गलत हैं, रोना! हसने के जितना ही जरूरी होता हैं, यही छोटी-छोटी बातें शुरू से ही हमारे कोंसेप्ट बन चुकी हैं जिसे हमें बदलना है। आज की बेटी पढ़ना चाहती है, कुछ करना चाहती है, अपने पैरो पर खड़ा होना चाहती है, ये तब ही मुमकिन है जब हम बेंटो को सही और गलत का पाठ पढ़ाएं। लड़कियों पर बढ़ रहे हादसों के कारण उनपर पाबंदी लगाने से अच्छा हैं की हम उस घटिया सोच पर पाबंदी लगाए जो महिलाओं को सबसे अलग कर रही है।

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