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Webinar : वयस्कों की तुलना में बच्चों को परामर्शन देना एक कठिन कार्य- प्रो. अनुभूति दुबे

Varanasi : वसंत महिला महाविद्यालय एवं भारतीय काउंसलिंग साइकोलॉजी एसोसिएशन के संयुक्त प्रयास से विशिष्ट प्रतिदर्शो के लिए परामर्शन प्रक्रिया की समझ नामक शीर्षक पर आयोजित अंतराष्ट्रीय ऑनलाइन कार्यशाला का शुक्रवार को दूसरा दिन रहा। इस सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब कार्यशाला के सत्र का प्रारंभ सह संयोजक डॉ सुभाष मीणा ने दोनों मध्यस्थता कर रही पाखी मिशेल तथा रोजी शांडिल्य का परिचय कराते हुए डॉक्टर रिचा सिंह को आमंत्रित किया। आयोजन सचिव ने मुख्य अतिथि तथा मुख्य वक्ता एवं सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और द्वितीय दिन की प्रथम मुख्य वक्ता प्रोफेसर अनुभूति दुबे का स्वागत किया। उनका संक्षिप्त परिचय देते हुए उनको बच्चों के लिए परामर्शन विषय पर वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया। प्रथम वक्ता ने “बच्चों के लिए परामर्शन” विषय पर अपने विभिन्न अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वयस्कों की तुलना में बच्चों को परामर्शन देना एक कठिन कार्य है, इसलिए बच्चों के साथ परामर्शन का कार्य करने वाले पेशेवरों को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। और सबसे आवश्यक बात की परामर्शक को बच्चों के मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए उससे बातचीत करनी चाहिए। यह मामला तब और अधिक गंभीर हो जाता है जब बच्चा बोल ना पाता हो, और बताने में असमर्थ हो। तब इस जटिल समय में परामर्शक को परामर्श कौशल का प्रयोग करके समस्या का पता लगाने का कोशिश करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि 40 से 45% बच्चों को कभी ना कभी परामर्श की आवश्यकता अवश्य ही होती है तथा 5 से 25% बच्चों की समस्या गंभीर श्रेणी की होती है।।इसी प्रकार 10 से 15% बच्चों को सांवेगिक समस्या अथवा व्यवहारात्मक् समस्याओं के लिए परामर्श की आवश्यकता होती है तो ऐसी स्थिति में परामर्शशक और परामर्शइन दोनों का ही महत्व स्वयं बढ़ जाता है। इसी क्रम में आयोजन सचिव ने द्वितीय प्रमुख वक्ता डॉ नरेंद्र सिंह ठागुना का स्वागत किया और उनका संक्षिप्त संक्षिप्त परिचय देते हुए उनको परामर्शन में निदान तथा मूल्यांकन विषय पर वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया। द्वितीय सत्र के प्रमुख वक्ता ने परामर्श में निदान तथा मूल्यांकन विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि परामर्शन का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि परामर्शक सबसे पहले अपने सेवार्थी को समझें उसके व्यवहार का निरीक्षण करें। तथा यदि आवश्यकता पड़े तो विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण की सहायता ले सकता है। इस प्रक्रिया में सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि परामर्शक को विश्वसनीय तथा वैद्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण का ही उपयोग करना चाहिए। तब वह सेवार्थी के समस्या को सही तरीके से पहचान सकेगा और उसकी सहायता करने का प्रयास करेगा।

इस अंतरराष्ट्रीय वेब कार्यशाला की संयोजिका डॉ सीमा श्रीवास्तव ने कहा कि परामर्शन का क्षेत्र भारत में भी धीरे-धीरे अपनी गति पकड़ रहा है और वास्तव में इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य परामर्शन के क्षेत्र में लोगों को जागरूक करना है। कार्यशाला के प्रथम संयोजक डॉ वेद प्रकाश रावत ने सभी प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों की समस्याओं को हम दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं पहली श्रेणी मूर्त समस्याओं की तथा दूसरी श्रेणी अमूर्त समस्याओं की।।मूर्त समस्याएं व्यवहार में प्रकट होती हैं तथा उसे आसानी से देखा जा सकता है लेकिन आमूर्त अथवा आंतरिक समस्याएं सांवेगिक अनुभूति से जुड़ी होती हैं जिसका परामर्शक को ध्यान रखना चाहिए तथा समस्या को पहचान कर उसके निवारण का उपाय खोजना चाहिए। इस सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब कार्यशाला में श्रीलंका ,सऊदी अरब, पाकिस्तान, ओमान, नेपाल, मोरक्को, बांग्लादेश, इंडोनेशिया तथा भारत देश के लगभग सभी राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा ले रहे है। कार्यशाला में डॉ आकांक्षी श्रीवास्तव ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया साथ ही साथ सत्र का संचालन भी किया।

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