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विश्वप्रसिद्ध रामलीला : मां कैकई को भरतजी अनेक उलाहनाएं देते हैं, भातृप्रेम की लीला सामाजिक आदर्शों के उच्च मानकों पर स्थापित

Sanjay Pandey

Varanasi : रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में सोमवार को भरत के भातृप्रेम की लीला सामाजिक आदर्शों के उच्च मानकों पर स्थापित रही। राम को वन भेजने वाली अपनी ही मां कैकई को वह अनेक उलाहनाएं देते हैं। वह राम को मनाने के लिए अयोध्या से निकल पड़ते हैं, भरत आगमन की लीला देखने के लिए लीला प्रेमियों की भीड़ उमड़ी थी। लीला की शुरुआत ननिहाल से भरत के अयोध्या पहुंचने से होती है।

भरत के आने की खबर सुनते ही कैकई आरती लेकर दौड़ती हैं। भरत को राजमहल ले जाती हैं और मायके का हालचाल पूछती है। इस बीच महल सूना-सूना देखकर भरतजी सीता-राम और लक्ष्मण के बारे में पूछते हैं। कैकई बड़े ही कुटिल भाव से बताती हैं कि महाराज तो सुरधाम चले गए और राम को भी वन जाना पड़ा। ऐसे में राजपाठ अब सब तुम्हारे हवाले है। इतना सुनते ही भरतजी बरस पड़े और कहा कि हे पापिन तुमने तो कुल का नाश कर दिया। ऐसा ही करना था तो मुझे जन्म ही क्यों दिया, कोख में ही क्यों नहीं मार दिया? इतने में कुबड़ी मंथरा सज धज कर आती है।

तभी शत्रुघ्न उसे देखते ही बरस पड़ते हैं, उसके बाल पकड़कर घसीटते हैं। भरत को दया आती है और उसे छोड़ने के लिए बोलते हैं। भरत व्याकुल होकर माता कौशल्या के पास बैठकर रुदन करते हैं। कौशल्या माता समझाती हैं, भरतजी कहते हैं कि तुम सब ठीक से रहना हम श्री रामचंद्र जी के पास जा रहे हैं, माता की आज्ञा लेकर दोनों भाई तमसा नदी के किनारे पहुंचते हैं।

रात्रि विश्राम करने के बाद श्रृंगवेरपुर पहुंचते हैं, भरतजी श्रृंरगवेपुर को देखकर गंगाजी को प्रणाम करते हैं। भारद्वाजजी भरतजी से कहते है- हे तात अब बहुत मत सोचो श्रीरामजी के चरण कमल देखते ही दुख समाप्त हो जाएगा। भारद्वाजजी कंदमूल मंगवाते हैं, कंदमूल फल खाकर सभी विश्राम करते हैं। लीला के ग्यारहवें दिन श्रीअवध में भरत आगमन, श्रीभरत का चित्रकूट प्रयाण, निषाद मिलन, गंगा अवतरण, भारद्वाज आश्रम निवास का मंचन किया गया।

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