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World Sparrow Day 2022 : विलुप्ति के कगार पर प्रजाति, अनुकरणीय है अर्जुन की गौरैया संरक्षण की कोशिश, इस तरह बने स्पैरोमैन

घरेलू गौरैया! गौरैया पक्षियों के पैसर वंश की एक जीववैज्ञानिक जाति है, जो विश्व के अधिकांश भागों में पायी जाती है। आरम्भ में यह एशिया, यूरोप और भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में पाई जाती थी लेकिन मानवों ने इसे विश्वभर में फैला दिया है। यह मानवों के समीप कई स्थानों में रहती हैं और नगर-बस्तियों में आम होती हैं।

लेकिन आज दुख की बात यह है कि मानव मित्र कही जाने वाली गौरैया अब लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। हालांकि, गांवों में अब भी हरियाली की वजह से बेहतर माहौल मिलने के कारण गौरेया देखने को मिल जाती है, लेकिन शहरों में स्थिति चिंताजनक है। शहर में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण गौरैया की घटती आबादी के प्रमुख कारणों में से एक है। इस बारे में पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि घरों के बनावट में तब्दीली, बदलती जीवन शैली, खेती के तरीकों में परिवर्तन, प्रदूषण, मोबाइल टाॅवर और दूसरे वजहों से ऐसा हो रहा है।

आपको जानकारी होगी कि गौरैया पर बचाने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। सुखद खबर यह है कि इन्हीं गौरैयों के प्रति अगाध प्रेम ने बिहार के रोहतास जिले के करगहर थाना क्षेत्र के मेड़रीपुर गांव के अर्जुन सिंह को स्पैरोमैन बना दिया है। अर्जुन के आंगन में हजारों गौरैया आज भी फुदकती हैं। गौरैयों पक्षी को बचाने के लिए लगभग एक दशक के परिश्रम व मेहनत से उन्हें यह मुकाम हासिल हो पाया है।

बताते हैं कि उनके प्रयास से हीं आज कई गांवों में गौरैयों की चहचहाहट गूंज रही है। उनका कहना है कि पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। अर्जुन बताते हैं कि 2004 में पिता और 2005 में पत्नी के निधन के बाद अपनी उदासी और अकेलापन के कारण गांव आ गया था। उसी वक्त की बात है खाना खाते समय कुछ गौरैया पास तक आती थी।तब बस यूं ही मैं उनकी तरफ खाना फेंकने लगा। गौरैयों को खाना मिलने लगा तो वे रेगुलर मेरे पास जुटने लगीं।

इसके बाद साल 2007 के शुरुआती महीनों की एक और घटना के कारण गौरैया के और करीब आ गए। वह बताते हैं अपने घर के आंगन में बैठे थे। तभी एक गौरैया का बच्चा चोटिल अवस्था में उनके पास आ गया। उन्होंने गौरैया के बच्चे को उठाकर उसका इलाज किया और उसे दाना-पानी देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे गौरैया का आना-जाना वहां शुरू होने लगा। देखते ही देखते उनके आंगन में सैकड़ों गौरैया का जमावड़ा दिखने लगा। इससे उन्हें शांति और खुशी मिली और गौरेया को नियमित सुबह-शाम दाना-पानी देने लगे। उन्होंने घर में गौरेया के लिए घोंसला बनाना शुरु किया।

उनके बड़े से कच्चे-पक्के घर में ऐसे घोंसले बनाने के लिए जगह की कमी भी नहीं थी। अभी उनके घर में करीब एक हजार घोंसले हैं। इसके साथ ही उन्होंने घर की छत, उसकी चारदीवारी और दूसरी कई जगहों पर गौरैया के प्यास बुझाने का इंतजाम भी कर रखा है। अर्जुन का कहना है कि गौरैयों को आबाद करने में बच्चों ने भी खास भूमिका निभाई है। गौरैया से दूर रहने पर बैचैनी महसूस होती है। उनके इस समर्पण के लिए उन्हें स्पैरोमैन के नाम से लोग जानने लगे है। सरकार ने 2013 में गौरैया को राज्य सरकार ने राजकीय पक्षी घोषित किया था।

जिसके बाद बिहार सरकार का पर्यावरण और वन विभाग सरकारी आवासों में गोरैया के लिए घोंसला लगाने की योजना पर अर्जुन सिंह की मदद ली गई थी। सबसे चिंताजनक बात है कि गौरैया की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है, लेकिन हर आदमी में इसे संरक्षण देने को लेकर अर्जुन की तरह न हीं सम्वेदना है और न हीं इच्छा शक्ति। सरकार की ओर से तो बस एक फरमान जारी कर 20 मार्च को गौरैया दिवस घोषित कर दिया गया है। इसे लेकर सरकार के पास न कोई आर्थिक योजना है और न कोई जिम्मेदारी या कोई जवाबदेही तय की गयी है।

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