Health Varanasi 

विश्व क्षय रोग दिवस 2022 : टीबी चैंपियन की कहानी, उन्हीं की जुबानी, पहले खुद लड़े, अब दूसरों का साथ दे रहे, कर रहे हौसला अफजाई

केस 01: राजा तालाब निवासी धनंजय किसान हैं। वर्ष 2012 में टीबी रोग ने उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया। शुरू में वह आस-पास के चिकित्सकों से उपचार कराते रहे पर रोग ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। तभी एक रिश्तेदार की सलाह पर उन्होंने मंडलीय चिकित्सालय-कबीरचौरा स्थित क्षय रोग केंद्र में जांच कराकर उपचार शुरू किया। नियमित दवा का सेवन और परहेज का नतीजा रहा कि अब वह पूरी तरह स्वस्थ तो है हीं टीबी चैंपियन बनकर इस रोग को खत्म करने की मुहिम का हिस्सा भी बन चुके है।

केस 02 : अर्दली बाजार के विष्णु मौर्य को भी चार साल पहले टीबी हुई थी। सरकारी अस्पताल में जांच और इलाज के बाद अब वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। रोजमर्रा के काम-काज के साथ ही विष्णु भी अब टीबी चैंपियन बनकर टीबी रोग को पूरी तरह खत्म करने की मुहिम का हिस्सा बन चुके हैं।

Varanasi : धनंजय और विष्णु ही नहीं मो. अहमद, संदीप, ओमप्रकाश, अजीत, दीपक और अतुल जैसे 13 ऐसे नाम हैं जो कभी टीबी रोग से ग्रसित थे। सरकारी अस्पताल में हुए निशुल्क उपचार, चिकित्सकों की सलाह, दवाओं के नियमित सेवन व परहेज का नतीजा है कि वह आज पूरी तरह स्वस्थ हैं। टीबी को मात देने के बाद चैंपियन बनकर अब टीबी रोग के समूल नाश की मुहिम का हिस्सा बन गए हैं।

जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. राहुल सिंह बताते हैं कि साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने को स्वास्थ्य विभाग ने ठान रखा है। इसके लिए चलायी जा रही मुहिम में ‘टीबी चैंपियन’ भी मददगार साबित हो रहे हैं। वह बताते हैं कि जिले में टीबी चैंपियन उन लोगों को चुना गया है जो कि पहले टीबी ग्रसित थे। जांच में टीबी की पुष्टि होने पर उन्होंने चिकित्सक के सुझाव के अनुसार दवा का नियमित सेवन कर बीमारी को मात दिया। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं और सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। इसके साथ ही अपने अनुभवों को समुदाय तक पहुंचाकर अब वह टीबी रोग के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण भी दिया गया है।

टीबी चैंपियन मो. अहमद बताते हैं कि हम अपने अनुभव के आधार पर लोगों को समझाते हैं कि अगर दो हफ्ते से अधिक खांसी आ रही है, बुखार बना रहता है, वजन घट रहा है, भूख नहीं लगती तो वह टीबी की जांच जरूर कराएं। यह भी बताते हैं कि इसकी जांच सरकारी अस्पतालों में मुफ्त की जाती है। जांच में यदि टीबी की पुष्टि होती है तो घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इसका पूर्ण इलाज संभव है। इसकी दवा टीबी अस्पताल, डॉट सेंटर या स्थानीय आशा कार्यकर्ता के माध्यम से मुफ्त प्राप्त की जा सकती है। मो. अहमद कहते हैं कि हम यह बात सभी को जरूर समझाते हैं कि दवा को बीच में छोड़ना नहीं है, नहीं तो टीबी गंभीर रूप ले सकती है।

टीबी चैंपियन दीपक पटेल कहते हैं कि हम लोगों को यह भी बताते हैं कि टीबी की पुष्टि होने पर मरीज का पूरा विवरण निक्षय पोर्टल पर दर्ज कराना जरूरी होता है। इसका फायदा यह होता है कि मरीज अगर कहीं दूसरे प्रदेश में जाता है तो उसे वहां भी मुफ्त दवा मिल जाती है। इसके अलावा टीबी मरीजों को इलाज के दौरान सही पोषण के लिए 500 रुपये प्रतिमाह सीधे बैंक खाते में दिया जाता है, क्योंकि सही पोषण मिलने से दवाएं जल्दी असर करती हैं। ऐसे सभी लाभ के लिए टीबी रोगी का नाम निक्षय पोर्टल पर दर्ज होना बेहद जरूरी है। इस तरह हम अपने अनुभवों को समुदाय से साझा कर लोगों को इस रोग के प्रति जागरूक कर रहे हैं, ताकि इस रोग का जल्द से जल्द खात्मा हो सके।

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