कभी हकीकत नहीं, सिर्फ झूठ: जब खासियत बन जाए महज शो-पीस, असलियत कहीं खो जाए
व्यंग्य हमारे समाज में “खासियत” का मतलब कुछ ऐसा हो गया है जैसे मोबाइल के पीछे लगी एक चमचमाती स्टिकर जो दिखता बहुत आकर्षक है, लेकिन जब उसे हटा दिया जाता है तो न तो उसमें कुछ नया निकलता है, न ही उसमें किसी प्रकार की ताजगी। “खासियत” अब ऐसी चीज बन गई है जो हम केवल अपने बारे में बताते हैं, लेकिन जब असलियत सामने आती है तो वह पूरी तरह से अलग होती है। हम अक्सर किसी से कहते हैं, “मेरी खासियत है कि मैं हमेशा दूसरों का…
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