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रामनगर की रामलीला: श्रीराम ने जयंत की एक आंख फोड़ी, राक्षस विराज मारा गया

रामनगर, वाराणसी: प्रसिद्ध रामलीला के पंद्रहवें दिन एक अत्यधिक भावुक और प्रेरणादायक प्रसंग मंचित किया गया, जिसमें श्रीराम ने अपने दिव्य धैर्य, करुणा और न्याय का परिचय दिया। भरत के अयोध्या लौटने के बाद, श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट से पंचवटी की ओर बढ़ रहे थे। वन में उनका स्वागत देवताओं और ऋषियों द्वारा हुआ, लेकिन इसी बीच एक अप्रत्याशित घटना ने सबका ध्यान खींचा। इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर सीता माता के चरणों में चोंच मारी, जिससे उनका पैर लहूलुहान हो गया। यह दृश्य…

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शारदीय नवरात्रि 2024: जानिए कलश स्थापना से लगायत पूजा से संबंधित सभी जानकारी, इन बातों का ख्याल रखिएगा

पंडित लोकनाथ शास्त्री वाराणसी: हिन्दू धर्म में मां दुर्गा जी की पूजा किये जाने का विधान है। विशेष तौर से नवरात्रि के दिनों में दुर्गा मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि माता के आशीर्वाद से भक्तों के सभी प्रकार के दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। इसलिए साधारण व्यक्तियों से लेकर देव गणों ने भी मां का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी सच्चे हृदय से आराधना की है। शास्त्रों में मां दुर्गा को आदि शक्ति और परब्रह्म कहकर पुकारा गया है। श्रीकृष्ण इस मां दुर्गा…

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रामनगर की रामलीला: रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई, भरत ने श्रीराम का खड़ाऊं सिंहासन पर स्थापित किया, खुद नंदीग्राम निवास

रामनगर, वाराणसी: ऐतिहासिक रामलीला में 14वें दिन का मंचन अद्वितीय भक्ति और समर्पण का प्रतीक बना। पौराणिक कथा के इस महत्त्वपूर्ण प्रसंग में श्रीराम के वनवास और भरत के त्याग का सजीव चित्रण हुआ। भरत, जिन्होंने अयोध्या के राजसिंहासन को त्यागकर श्रीराम के खड़ाऊं को ही राजा मान लिया, अपनी भक्ति और समर्पण से दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गए। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब श्रीराम वनवास के लिए निकले, तब भरत ने अयोध्या की राजगद्दी को स्वीकारने से मना कर दिया। उनका प्रेम और समर्पण ऐसा था…

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शारदीय नवरात्र: बुराई पर अच्छाई की जीत निश्चित, शक्ति की उपासना और धर्म की स्थापना का महापर्व

शारदीय नवरात्र, देवी दुर्गा की नौ शक्तियों की आराधना का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है और इसे शक्ति की उपासना का सबसे पावन समय माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में भक्तगण उपवास रखते हैं, मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं, और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आशीर्वाद…

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पितृपक्ष में दही खाना: परंपरा और मान्यताएं, खाने-पीने के कुछ नियम विशेष रूप से ध्यान देने योग्य

पितृपक्ष, जिसे श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण समय होता है जब लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। इस अवधि में खाने-पीने के कुछ नियम और परंपराएं विशेष रूप से ध्यान देने योग्य होती हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख सवाल है- पितृपक्ष में दही खाना चाहिए या नहीं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में सादा और सात्विक भोजन का पालन करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस समय तामसिक और भारी भोजन…

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गोधूलि बेला में पूजा: विशेष महत्व और शुभ फल का प्रतीक, मंत्र जाप और आरती का विशेष प्रभाव

वाराणसी: हिंदू धर्म में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है, और समय का भी इसमें अहम योगदान होता है। इन्हीं समयों में से एक है गोधूलि बेला, जिसे अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। गोधूलि बेला सूर्यास्त से पहले का वह समय है जब दिन और रात का मिलन होता है, और इस समय पूजा-अर्चना करने से देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गोधूलि बेला का नाम “गौ” और “धूलि” से आया है, जिसका अर्थ है गायों के पैरों से उठी धूल। मान्यता है कि जब गोधूलि के समय…

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पितृ पक्ष में पिंडदान का महत्व: पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष का पावन अनुष्ठान

वाराणसी: हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह समय पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने, उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पिंडदान और तर्पण करने का पवित्र काल माना जाता है। पितृ पक्ष हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक 16 दिनों का होता है। इस दौरान अपने पूर्वजों का आशीर्वाद पाने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए लोग पिंडदान करते हैं। पिंडदान का धार्मिक…

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रामनगर की रामलीला: भरत के त्याग ने देवताओं को असमंजस में डाला, बरसात पर श्रद्धालुओं ने धरमपूर्वक इंतजार किया

वाराणसी, रामनगर: विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में तेरहवें दिन का मंचन भावुकता और आदर्शों से भरा रहा। भरत, जो त्याग की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं, ने ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने देवताओं को भी असमंजस में डाल दिया। भरत ने श्रीराम से आग्रह किया कि वे अयोध्या लौटें और स्वयं वनवास का दायित्व वहन करने का प्रस्ताव दिया। यह प्रसंग रामायण के उन आदर्शों को जीवंत करता है, जो पारिवारिक त्याग, प्रेम और कर्तव्य की महानता को स्थापित करते हैं। भरत का त्याग, आदर्शों की पराकाष्ठा लीला का यह दृश्य…

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जानिए इसके पीछे का रहस्य: पितृपक्ष में दाढ़ी और बाल क्यों नहीं बनवाए जाते हैं और नाखून काटने से परहेज क्यों किया जाता है?

भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का विशेष महत्व है। इनमें से एक महत्वपूर्ण समय है पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए कई धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। यह समय विशेष रूप से पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए समर्पित होता है। पितृ पक्ष में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है, जिनमें दाढ़ी और बाल न बनवाना तथा नाखून न काटना प्रमुख हैं। इन परंपराओं के पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक…

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रामनगर की रामलीला: भरत और श्रीराम के मिलन ने छलकीं भक्तों की आंखें, बरसात से चतुरंगिणी सेना की सलामी पर असर

वाराणसी, रामनगर: विश्वविख्यात रामलीला का हर दृश्य जब मंचित होता है, तो वह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि आस्था और पौराणिकता का जीवंत चित्रण बन जाता है। रामलीला के तेरहवें दिन जिस प्रकार से भरत और श्रीराम का मिलन हुआ, उसने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। यह लीला केवल एक मंचन नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम, और त्याग की अद्वितीय प्रस्तुति थी, जो दर्शकों की आस्था को और अधिक गहराई में ले जाती है। भरत का त्याग और लक्ष्मण का क्रोध, धर्म और प्रेम की पराकाष्ठा इस दृश्य में भरत…

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